| 5. कांग्रेसी प्रणाली : चुनौतियाँ और पुनर्स्थापना |
प्रश्न 1. 1967 के चुनावों के बारे में निम्नलिखित में कौन-कौन से बयान सही है।
(क) कांग्रेस लोकसभा के चुनाव में विजयी रही, लेकिन नई राज्यों में विधान सभा के चुनाव वह हार गई।
(ख) कांग्रेस लोकसभा के चुनाव भी हारी और विधान सभा के भी।
(ग) कांग्रेस को लोकसभा में बहुमत नहीं मिला, लेकिन उसने दूसरी पार्टिया के समर्थन से एक गठबन्धन सरकार बनाई।
(घ) कांग्रेस केन्द्र में सत्तासीन रही और उसका बहुमत भी बढ़ा।
उत्तर- (क)
प्रश्न 2. निम्नलिखित का मेल करें:
उत्तर-
(1) – (घ)
(2) – (क)
(3) – (ख)
(4) – (ग)
प्रश्न 3. निम्नलिखित नारे से किन नेताओं का सम्बन्ध है।
(क) जय जवान जय किसान
(ख) इंदिरा हटाओ
(ग) गरीबी हटाओं
उत्तर- (क) लाल बहादुर शास्त्री
(ख) विपक्षी दल
(ग) श्रीमती इंदिरा गाँधी
प्रश्न 4. 1971 के ग्रैंड अलाइंस के बारे में कौन-सा कथन ठीक है?
(क) इसका गठन गैर-कम्युनिस्ट और गैर-कांग्रेसी दलों ने किया था।
(ख) इसके पास एक स्पष्ट राजनीतिक तथा विचारधारात्मक कार्यक्रम था।
(ग) इसका गठन सभी गैर-कांग्रेसी दलों ने एक जुट होकर किया था।
उत्तर- (क)
प्रश्न 5. किसी राजनीतिक दल को अपने अंदरुनी मतभेदों का समाधान किस तरह करना चाहिए? यहाँ कुछ समाधान दिए गये हैं। प्रत्येक पर विचार कीजिए और उसके सामने उसके फायदों और घाटों को लिखिए।
(क) पार्टी के अध्यक्ष द्वारा बताए गए मार्ग पर चलना।
(ख) पार्टी के भीतर बहुमत की राय पर अमल करना।
(ग) प्रत्येक मामले पर गुप्त मतदान करना।
(घ) पार्टी के वरिष्ठ और अनुभवी नेताओं से सलाह करना।
उत्तर- (क) पार्टी के अध्यक्ष का पद बहुत ही महत्त्वपूर्ण होता है अतः उसकी सलाह अथवा आदेश महत्त्वपूर्ण होता है जिसका पालन करना चाहिए। हालांकि अगर वह गलत हो तो उसको अध्यक्ष से कहा जाना चाहिए कि वह गलत है प्रजातंत्र में इस प्रकार की सलाह देना गलत नहीं है। इससे पार्टी मजबूत ही होगी।
(ख) बहुमत के द्वारा आमतौर से निर्णय लिये जाते हैं। अतः किसी भी राजनीतिक दल में भी किसी विषय पर निर्णय बहुमत के आधार पर लिया जा सकता है।
(ग) कोई भी दल बिना आन्तरिक प्रजातंत्र के मजबूत नहीं हो सकता अतः प्रत्येक मंच पर व प्रत्येक विषय पर खुलकर विचार विमर्श, बहस व आम सहमति बननी चाहिए। और अगर आवश्यक हो तो मतदान भी कराया जा सकता है। गुप्त मतदान ही ज्यादा प्राकृतिक व प्रजातान्त्रीय माना जाता है। क्योंकि गुप्त तदान में ही व्यक्ति स्वतन्त्रता से अपना निर्णय ले सकता है।
(घ) किसी भी मंच पर, संस्था में व राजनीतिक दल में सलाह व मशवरा व परामर्श की प्रक्रिया होनी ही चाहिए। जिससे उसमें सभी सदस्यों में एक प्रकार का जुड़ाव बना रहता है किसी भी राजनीतिक दल के वरिष्ठ व अनुभवी व्यक्तियों को पार्टी में उचित सम्मान व स्थान मिलना ही चाहिए व विभिन्न महत्वपूर्ण विषयों पर उनके परामर्श व विचारों को सम्मान अवश्य ही मिलना चाहिए ताकि वे पार्टी में अपनी सकारात्मक भूमिका अदा कर सकें।
प्रश्न 6. निम्नलिखित में से किसे/किन्हें 1967 के चुनावों में कांग्रेस की हार के कारण के रूप में स्वीकार किया जा सकता है? अपने उत्तर की पुष्टि में तर्क दीजिए।
(क) कांग्रेस पार्टी में आश्चर्यजनक नेतृत्व का अभाव
(ख) कांग्रेस पार्टी के भीतर टूट
(ग) क्षेत्रीय, जातीय और सांप्रदायिक समूहों की लाभ बंदी को बढ़ाना
(घ) कांग्रेस पार्टी के अन्दर मतभेद
उत्तर- (क) उपरोक्त कारणों से 1967 में कांग्रेस की हार का प्रमुख कारण कांग्रेस पार्टी के पास करिश्माई नेतृत्व का अभाव था। क्योंकि 1964 में पंडित जवाहरलाल का देहान्त होने के बाद कांग्रेस का नेतृत्व श्री लाल बहादुर शास्त्री ने संभाला जिनकी 1966 में मृत्यु हो गई। इसके बाद श्रीमति इंदिरा गाँधी ने नेतृत्व संभाला जिनको राजनीतिक व प्रशासनिक अनुभव अधि क नहीं था। वे कांग्रेस के सीनियर नेताओं के गुट पर निर्भर थी। इस कारण से 1967 के चुनाव में कांग्रेस के प्रभाव में कमी आयी।
(घ) अन्य दूसरा कारण कांग्रेस के प्रभुत्व में कमी के कारण कई राज्यों की हारा था। इस चुनाव में गैर-कांग्रेसी दलों ने एक गठबन्धन बना लिया जिससे गैर-कांग्रेसी वोट का विभाजन नहीं हुआ क्योंकि इससे पहले गैर-कांग्रेसी वोट विभाजित हो जाते थे जिसका लाभ कांग्रेस को मिलता था । परन्तु 1967 के चुनाव में ऐसा नहीं हुआ। अतः कांग्रेस की वोट व सीटों में कमी आने का एक यह भी कारण था।
प्रश्न 7. 1970 के दशक में इंदिरा गाँधी की सरकार किन कारणों से लोकप्रिय हुई थी?
उत्तर- 1970 के दशक में श्रीमती इंदिरा गाँधी अत्यन्त लोकप्रिय हो गयी थी। 1969 में कांग्रेस के विभाजन के बाद अपनी पार्टी अर्थात् नई कांग्रेस पर उसका प्रभुत्व था। पुरानी कांग्रेस व नई कांग्रेस के बीच संघर्षो को उसने वैचारिक संघर्ष करा दिया। श्रीमती इंदिरा गाँधी ने अपनी नीतियों में समाजवादी व साम्यवादी आधार देकर किसानों व मजदूरों को अपनी ओर आकर्षित कर लिया। इंदिरा गाँधी का नारा था कि ‘गरीबी हटाओं’ अत्यन्त प्रभावकारी सिद्ध हुआ इंदिरा गाँधी ने अपनी लोकप्रियता को बढ़ाने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र की संवृद्धि के लिए अनेक प्रकार के कार्यक्रम प्रारम्भ किये जिनमें से प्रमुख निम्न थे –
- प्रिवीपर्स की समाप्ति
- बैंकों को राष्ट्रीकरण
- ग्रामीण भू-स्वामित्व और शहरी सम्पदा के परसीमन
- सामाजिक व आर्थिक विषमताओं व असमानताओं की समाप्ति
- भूमिहीन किसानों के लिए सुविधाएँ
- दलित व आदिवासियों के लिए विशेष कार्यक्रम
- जमीन सुधारों पर जोर
- नौजवानों के लिए रोजगार के अनेक अवसर
- अल्पसंख्यकों में विश्वास उत्पन्न करने के लिए अनेक उपाय
- गरीबी उन्मूलन योजनाओं का प्रारम्भ
प्रश्न 8. 1960 के दशक की कांग्रेस पार्टी के संदर्भ में सिंडीकेट का क्या अर्थ है? सिंडीकेट ने कांग्रेस पार्टी में क्या भूमिका निभाई?
उत्तर- 1960 के दशक में कांग्रेस के भीतर ताकतवर व प्रभावकारी नेताओं के समूह को ‘सिंडीकेट’ के नाम से जाना जाता था। इस संगठन के नेताओं का कांग्रसे पार्टी का नियन्त्रण था। सिंडीकेट के प्रमुख नेता मद्रास के पूर्व मुख्यमंत्री व कांग्रेस के अध्यक्ष रह चुके कामराज थे। इस संगठन में कुछ राज्यों के प्रमुख ताकतवर नेता भी थे। जैसे बम्बई से एस. के. पाटिल मैसूर के एस. निजलिंगप्पा, आन्ध्र प्रदेश के एन. संजीवा रेड्डी व पश्चिमी बंगाल के अतुल्य घोष थे।
लाल बहादुर शास्त्री व श्रीमती इंदिरा गाँधी दोनों ही सिंडिकेट के समर्थन से ही प्रधानमंत्री बने। इंदिरा गाँधी व लाल बहादुर शास्त्री के मंत्रिमंडल के निर्माण में भी सिंडिकेट की अहम भूमिका रही। यहाँ तक की सरकार की नीतियों के निर्धारण व क्रियान्वयन में भी सिंडिकेट की अहम भूमिका रही परन्तु इंदिरा गाँधी के शक्तिशाली बनने के बाद यह गुट धीरे-धीरे शक्तिहीन हो गया। 1969 में राष्ट्रपति के चुनाव में इस गुट के उम्मीदवार श्री एन. संजीवा रेड्डी के हारने के बार इंदिरा गाँधी की कांग्रेस ही वास्तविक कांग्रेस के रूप में उभर कर आयी।
यद्यपि सिंडिकेट के नेताओं को प्रारम्भ में यह उम्मीद थी कि इंदिरा गाँधी प्रधानमंत्री के रूप में उनके परामर्श पर ही कार्य करेंगी परन्तु ऐसा केवल थोड़े दिन ही रहा इसके बाद इंदिरा गाँधी ने अपने व्यक्ति व अपनी नीतियों के आधार पर अपना अलग जनाधार बना लिया धीरे-धीरे उसने सिंडीकेट के नेताओं को हाशिए पर ला खड़ा किया यद्यपि प्रारम्भ में सिंडीकेट ने कांग्रेस के प्रत्येक निर्णय में निर्णायक भूमिका निभाई परन्तु बाद में कांग्रेस पर पूर्णतः श्रीमती इंदिरा गाँधी का ही नियंत्रण हो गया।1960 की कांग्रेस पर सिंडीकेट का नियन्त्रण था । परन्तु 1970 की कांग्रेस पर श्रीमती इंदिरा गाँधी का नियन्त्रण हो गया।
प्रश्न 9. कांग्रेस पार्टी किन मसलों को लेकर 1969 में टूट की शिकार हुई।
उत्तर- 1967 के आम चुनावों में कांग्रेस का प्रभुत्व कम होता नजर आया क्योंकि 1967 के चुनाव में कांग्रेस के हाथ से कई राज्यों की सरकारें निकल गई अर्थात् कई राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, केरल, उड़ीसा, मध्यप्रदेश में कांग्रेस सरकार नहीं बन पायी व केन्द्र में भी कांग्रेस पार्टी केवल साधारण बहुमत से ही सरकार बना पायी। 1967 के चुनाव के बाद कांग्रेस के बीच आन्तरिक स्तर पर सत्ता संघर्ष प्रारम्भ हो गया। कांग्रेस का एक बड़ा प्रभावशाली नेताओं का गुट सरकार पर नियंत्रण करना चाहता था परन्तु इंदिरा गाँधी धीरे-धीरे अपना नियंत्रण सरकार व पार्टी पर बनाने के प्रयास में लगी थी।
कांग्रेस के बीच अर्थात् इंदिरा गाँधी व सिडीकेट के बीच सत्ता संघर्ष की लड़ाई 1969 में राष्ट्रपति के चुनाव में आमने-सामने आ गयी जब कांग्रेस के अधिकारिक उम्मीदवार के खिलाफ राष्ट्रपति पद के लिए श्रीमती इंदिरा गाँधी ने अपने स्वतन्त्र उम्मीदवार के रूप में तत्कालीन उपराष्ट्रपति डॉ. वी.वी गिरी को न केवल खड़ा किया बल्कि उसकी जीत भी निश्चित की जिसके कारण श्रीमती इंदिरा गाँधी को कांग्रेस से निष्कासित कर दिया। जिसके फलस्वरूप 1969 में कांग्रेस में औपचारिक रूप से विभाजन हो गया व धीरे-धीरे पुरानी कांग्रेस क्षीण हो गई व इंदिरा गाँधी की नई कांग्रेस ही वास्तविक कांग्रेस उभर कर आयी। इस विवरण से पता लगता है कि 1969 में कांग्रेस के विभाजन के प्रमुख कारण निम्न विषय थे –
- सिंडीकेट का प्रभावकारी रुख
- सिंडीकेट व श्रीमती इंदिरा गाँधी के बीच सत्ता संघर्ष
- राष्ट्रपति का चुनाव जिसमें श्रीमती इंदिरा गाँधी ने कांग्रेस के अधिकारिक उम्मीदवार के खिलाफ डॉ. वी.वी. गिरी को खड़ा किया।
- श्रीमती इंदिरा गाँधी की अपनी स्वतन्त्र रूप से कार्य करने की शैली।
- कांग्रेस की आन्तरिक गुटबाजी
- इंदिरा गाँधी की बढ़ती हुई लोकप्रियता
प्रश्न 10. निम्नलिखित अनुच्छेद को पढ़े और इसके आधार पर पूछे गये प्रश्नों के उत्तर दें।
इंदिरा गाँधी ने कांग्रेस को अत्यन्त केन्द्रीकृत और अलोकतांत्रिक पार्टी संगठन में तब्दील कर दिया। जबकि नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस शुरूआती दशकों में एक संघीय लोकतांत्रिक और विचारधाराओं के समाहार का मंच थी। नयी और लोकलुभावन राजनीति ने राजनीतिक विचारधारा को महज चुनावी विमर्श में बदल दिया। कई नारे उछाले गये लेकिन इसका मतलब यह नहीं था कि उसी के अनुकूल सरकार को नीतियाँ भी बनानी थी- 1970 के दशक के शुरूआती सालों में अपनी बड़ी चुनावी जीत के जश्न के बीच कांग्रेस एक राजनीतिक संगठन के तौर पर मर गई।
(क) लेखक के अनुसार नेहरू और इंदिरा गाँधी द्वारा अपनाई गई रणनीतियों में क्या अन्तर था।
(ख) लेखक ने क्यों कहा कि सत्तर के दशक में कांग्रेस मर गई?
(ग) कांग्रेस पार्टी में आये बदलावों का असर दूसरी पार्टियों पर कि तरह पड़ा?
उत्तर- (क) यद्यपि पंडित जवाहर लाल नेहरू व श्रीमती इंदिरा गाँधी दोनों के ही करिश्माई व्यक्तित्व थे परन्तु दोनों की कार्य शैली भिन्न थी पंडित नेहरू का पार्टी पर व्यापक प्रभाव स्वयं ही था परन्तु दोनों की कार्य शैली भिन्न थी पंडित नेहरू का पार्टी पर व्यापक प्रभाव स्वयं ही था परन्तु इंदिरा गाँधी ने एक राजनीतिक योजना के तहत पार्टी पर अपना प्रभुत्व स्थापित किया। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कांग्रेस में आन्तरिक प्रजातन्त्र स्थापित किया। जबकि इंदिरा गाँधी की कार्य शैली में अधिनायकवाद झलकता था। पंडित जवाहर लाल नेहरू के समय वरिष्ठ कांग्रेसियों को सम्मानजक स्थान प्राप्त था परन्तु श्रीमती इंदिरा गाँधी ने उन्हीं लोगों को हाशिये पर रख दिया जिन वरिष्ठ नेताओं ने इंदिरा गाँधी को प्रधानमंत्री बनाने में मदद की थी।
पंडित जवाहर लाल नेहरू एक अन्तर्राष्ट्रीय व्यापक नजरिया रखने वाले नेता थे जबकि श्रीमती इंदिरा गाँधी की राजनीति सत्ता राजनीति तक ही सीमित थी। पंडित जवाहर लाल नेहरू एक धैर्यवान नेता थे जो सभी की सुनते वे सभी के विचारों की कदर करते थे जबकि श्रीमती इंदिरा गाँधी विरोध सुनना पसंद नहीं करती थी। पंडित जवाहर लाल नेहरू में आम सहमति व समायोजन की क्षमता थी जो श्रीमती इंदिरा गाँधी में नहीं थी।
(ख) लेखक ने सही ही कहा कि सत्तर के दशक में कांग्रेस मर गई क्योंकि सत्तर के दशक में कांग्रेस की न तो वे संस्कृति थी, ना ही वह नेतृत्व था और ना ही वह प्रभाव था जो साठ के दशक में था सत्तर के दशक में श्रीमती इंदिरा गांधी का नेतृत्व था जो साठ के दशक के नेहरू शास्त्री के नेतृत्व से बिल्कुल भिन्न था। नेहरू व शास्त्री के नेतृत्व में प्रजातंत्रीयवाद, धैर्य व खुलापन था परन्तु ये सभी गुण श्रीमती इंदिरा गाँधी में नहीं थे।
इंदिरा गाँधी में अधिनायकवाद व रूढ़ता थी। इसके अलावा सत्तर की कांग्रेस की संस्कृति साठ के दशक की संस्कृति से भिन्न थी। सत्तर के दशक में कांग्रेस में ही गुटबाजी व सत्ता संघर्ष था जबकि साठ के दशक में सहनशीलता व्यापकता व आपसी सूझबूझ, सामजस्य व संवाद की संस्कृति थी। पुरानी कांग्रेस में मूल्यों पर आधारित राजनीति थी। सत्तर के दशक में अवसरवाद व गुटबाजी की राजनीति थी साठ के दशक में राष्ट्रीय आन्दोलन के समय का राष्ट्रवाद व संस्कृति थी लेकिन सत्तर के दशक में राष्ट्रीय आन्दोलन का जज्बा धीरे-धीरे समाप्त हो रहा था। साठ के दशक में सेवा की राजनीति थी लेकिन सत्तर के दशक में वोट व सत्ता की राजनीति थी अतः लेखक ने सही कहा कि सत्तर के दशक में कांग्रेस मर चुकी थी उसकी जगह दूसरी कांग्रेस ने दूसरे रूप में अवतार लिया।
(ग) 1964 में पंडित जवाहर लाल नेहरू के देहान्त व 1966 में लाल बहादुर शास्त्री के देहान्त के बाद कांग्रेस में नेतृत्व का संकट अर्थात् एक रिक्त स्थान पैदा हो गया। 1966 में श्री लाल बहादुर शास्त्री के देहान्त के बाद श्रीमती इंदिरा गाँधी का प्रधानमंत्री तो अवश्य बनाया गया परन्तु कांग्रेस पर सिंडिकेट का नियंत्रण था। सिंडिकेट कांग्रेस के विभिन्न राज्यों के शक्तिशाली व प्रभावशाली लोगों का समूह था जिनके प्रमुख नेता श्री कामराज थे।
धीरे-धीरे श्रीमती इंदिरा गाँधी ने अपना प्रभाव बढ़ाना प्रारम्भ कर दिया व समाजवादी व साम्यवादी विचारधारा के आधार पर किसान व मजदूरों के हित सम्बन्धी नीतियाँ बनाना प्रारम्भ किया। कांग्रेस में भी सिंडिकेट के नेताओं व श्रीमती इंदिरा गाँधी के बीच सत्ता संघर्ष प्रारम्भ हो गया जो 1969 में राष्ट्रपति के चुनाव में सामने आ गया जो बाद में कांग्रेस के विभाजन के रूप में बदल गया। 1967 के चुनाव में ही गैर-कांग्रेसवार की राजनीति का प्रभाव प्रारम्भ हो गया था जिसके परिणाम स्वरूप 1967 के चुनावों में 9 राज्यों में गैर-कांग्रेसी सरकारें बनीं। 1971 में भी कांग्रेस के विरुद्ध मुख्य विरोधी दलों ने एक बड़ा एन्टी कांग्रेस अलाइंस बनाया परन्तु इनको अधिक सफलता नहीं मिली। गैर-कांग्रेसवाद ने ही गठबन्धन की राजनीति को जन्म दिया।
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