| 6. लोकतांत्रिक व्यवस्था का संकट |
प्रश्न 1. बताइए कि आपात काल के बारे में निम्नलिखित कथन सही है या गलत–
(क) आपातकाल की घोषणा 1975 में इंदिरा गाँधी ने की।
(ख) आपातकाल में सभी मौलिक अधिकार निष्क्रिय हो गये।
(ग) बिगड़ती हुई आर्थिक स्थिति के मद्देनजर आपातकाल की घोषणा की गई थी।
(घ) आपात काल के दौरान के अनेक नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया।
(ङ) सी.पी.आई. ने आपातकाल की घोषणा का समर्थन किया।
उत्तर- (क) – सही
(ख) – सही
(ग) – गलत
(घ) – सही
(ङ) – सही
प्रश्न 2. निम्नलिखित में से कौन-सा अपातकाल की घोषणा के संदर्भ से मेल नहीं खाता है।
(क) सम्पूर्ण क्रांति का आह्वान
(ख) 1974 की रेल हड़ताल
(ग) इलाहाबाद उच्चन्यायलय का फैसला
(घ) शाह कमीशन की रिपोर्ट का निष्कर्ष
उत्तर- (ख)
प्रश्न 3. निम्नलिखित में मेल बैठाएं:
उत्तर-
(1) – (ख)
(2) – (क)
(3) – (ग)
(4) – (घ)
प्रश्न 4. किन कारणों से 1980 में मध्यावधि चुनाव करवाने पड़े?
उत्तर- आपतकाल की स्थिति 1977 में समाप्त हुई व 1971 में संसदीय चुनाव किये गये। इस चुनाव में कांग्रेस के खिलाफ प्रमुख विरोधी दलों ने मिलकर जनता पार्टी का गठन किया जिसे बाबू जयप्रकाश नारायण व आचार्य कृपलानी का आशीर्वाद प्राप्त था। इनमें प्रमुख दल सोसलिस्ट पार्टी, भारतीय जनसंघ, कांग्रेस ओल्ड व भारतीय लोक दल थे। बाद में जगजीवन राम की कांग्रेस फार डोमोक्रेसी भी जनता पार्टी में शामिल हो गयी। ये सभी दल आपातकालीन समय में प्रमुख विरोधी दल थे तथा इनके प्रमुख नेता जेल में बन्द थे।
चुनाव में जनता पार्टी को भारी सफलता मिली परन्तु 351 सीटों के बावजूद यह सरकार केवल 18 महीने ही चल पायी क्योंकि प्रधानमंत्री के पद पर ही झगड़ा हो गया जिसके कारण श्री मोजराजी भाई देसाई को प्रधानमंत्री बनाने के साथ-साथ श्री जगजीवन राम को और चौधरी चरण सिंह को भी उपप्रधानमंत्री बनाना पड़ा।
जनता पार्टी में इतने अधिक आन्तरिक मतभेद थे कि एक पार्टी के रूप में ये कार्य नहीं कर सके व 18 महीने बाद सरकार गिर गई व पार्टी का कई हिस्सों में विभाजन हो गया। जनता पार्टी की सरकार गिरने के बाद चौधरी चरण सिंह ने कांग्रेस को बाहरी समर्थन से केन्द्र में सरकार बनाई परन्तु चार महीने बाद कांग्रेस के द्वारा समर्थन वापस लेने के कारण चौधरी चरण सिंह की सरकार भी गिर गई। चौधरी चरण सिंह ने लोकसभा भंग करके नये चुनाव कराने की सिफारिश की जिसको तत्कालीन राष्ट्रपति श्री एन. संजीवा रेड्डी ने स्वीकार कर लिया। इस प्रकार से 1980 में चुनाव आवश्यक हुए।
प्रश्न 5. जनता पार्टी ने 1977 में शाह आयोग को नियुक्त किया था। इस आयोग की नियुक्ति क्यों की गई थी और इसके क्या निष्कर्ष थे?
उत्तर- 1977 के मई में जनता पार्टी की सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के भूतपूर्व मुख्य न्यायाधीश श्री. जे.सी. शाह की अध्यक्षता में एक आयोग गठित किया। इस आयोग का गठन 25 जून 1975 के दिन घोषित आपातकाल के दौरान की गई कार्यवाही तथा सत्ता के दुरूपयोग, अत्याचार के विभिन्न आरोपों में विभिन्न पहलुओं की जाँच के लिए किया गया था। आयोग ने विभिन्न प्रकार के साक्ष्यों की जाँच तथा गवाहों के बयान दर्ज किये आयोग ने अपनी रिपोर्ट में विभिन्न तथ्यों के आधार पर अपने निष्कर्ष दिये जिन पर सरकार ने विचार विमर्श कर स्वीकार की।
शाह आयोग ने अपनी रिपोर्ट में पाया कि इस अवधि में बहुत सारी ज्यादतियाँ हुई। इसके अतिरिक्त भारतीय संविधान के साथ जरूरत से ज्यादा छेड़छाड़ की गयी। सरकारी अधिकारियों ने अपने पदों व अधिकार का दुरूपयोग किया। लोगों की स्वतन्त्रता व अधिकारों का हनन किया गया। प्रेस पर अनावश्यक पाबन्दियाँ लगाई गयी। शाह आयोग का निष्कर्ष था कि निवारक नजरबन्दी के कानून के तहत लगभग एक लाख ग्यारह हजार लोगों को गिरफ्तार किया गया। शाह आयोग ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि दिल्ली बिजली आपूर्ति निगम के महाप्रबन्धक को दिल्ली के लेफ्टिनेंट गवर्नर के दफ्तर से 21 जून 1975 की रात दो बजे मौखिक आदेश मिला कि सभी अखबारों की बिजली आपूर्ति काट दी जाये।
प्रश्न 6. 1975 में राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा करते हुए सरकार ने इसके क्या कारण बताए थे?
उत्तर- विभिन्न आर्थिक व राजनीतिक कारणों से गैर कांग्रेसी राजनीतिक दलों ने देश के विभिन्न भागों में आन्दोलन प्रारम्भ किये हुए थे। जगह-जगह हड़ताल बाँध व धरनों का आयोजन किया जा रहा था। बिहार में विद्यार्थी भी इस आन्दोलन में कूद पड़ें थे। प्रशासन एक प्रकार से ठप्प हो गया था। क्षेत्रीय आन्दोलनों का प्रभाव राष्ट्रीय स्तर पर पड़ रहा था। यद्यपि 1971 में भारी सफलता प्राप्त करके चुनावों में श्रीमती इंदिरा गाँधी विजयी हुई थी। 1974 में तो देश में एक प्रकार से अराजकता की स्थिति हो गयी थी। कई राज्यों में नक्सलवादी गतिविधियाँ फैल रही थी। 1975 में जय प्रकाश नारायण ने जनता के संसद मार्च का नेतृत्व किया।
सरकार ने विरोधी दलों के आन्दोलन को दबाने के लिए 25 जून 1975 के दिन आपातकालीन स्थिति की घोषणा कर दी जिसके निम्न कारण बताए –
- आपातकालीन स्थिति को घोषणा संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत की गयी जिसका अर्थ है कि आन्तरिक गड़बड़ी के कारण आपातकालीन स्थिति की घोषणा की गई।
- सरकार का कहना था कि चुनी हुई सरकारों को काम करने नहीं दिया जा रहा था।
- जगह-जगह आन्दोलन व धरनों का आयोजन हो रहा था।
- अनेक क्षेत्रों में आन्दोलनों के कारण हिंसक घटनाएं हो रही थी।
- सेना व पुलिस को बगावत व विद्रोह के लिए उकसाया जा रहा था।
- साम्प्रदायिक उन्माद को हवा दी जा रही थी।
- राष्ट्रीय एकता व अखंडता को खतरा हो रहा था।
- राजनैतिक अस्थिरता उत्पन्न करने का प्रयास किया जा रहा था।
- कानून के शासन को खतरा उत्पन्न हो रहा था।
- अर्थव्यवस्था का संकट और गहरा रहा था।
प्रश्न 7. 1977 के चुनावों के बाद पहली दफा केन्द्र में विपक्षी दल की सरकार बनी। ऐसा किन कारणों से सम्भव हुआ?
उत्तर- 1977 के चुनाव में पहली बार केन्द्र में कांग्रेस सरकार नहीं बना पायी व पहली बार ही विपक्षी दलों की सरकार केन्द्र में बन पायी हालांकि 1967 के चुनाव में भी गैर-कांग्रेसवाद के नारे पर विपक्षी दलों ने इक्ट्ठे होकर चुनाव लड़े थे परन्तु केन्द्र में तो कांग्रेस सरकार बना पायी थी हालांकि 1967 के चुनावों में कांग्रेस को 9 राज्यों में सरकार गवानी पड़ी थी। इस बार अर्थात् 1977 के चुनावों में अनेक कारणों से कांग्रेस विरोधी धारणा ज्यादा तेज थी जिसके कारण उत्तर भारत में तो कांग्रेस का पूरी तरह से सफाया हो गया था। यहाँ तक की श्रीमती इंदिरा गाँधी भी रायबरेली से चुनाव हार गयी थी। 1977 के चुनाव में कांग्रेस के प्रमुख कारण निम्न थे–
- देश का आर्थिक संकट
- आवश्यक चीजों की कीमतों में वृद्धि
- सभी विरोधी दलों का एक जुट हो जाना
- जनता पार्टी का निर्माण
- जय प्रकाश नारायण का विरोधी दलों को आशीर्वाद
- आपातकाल की ज्यादतियाँ
- न्यायपालिका व कार्यपालिका का टकराव
- संविधान को पूरा बदलने का प्रयास
- प्रेस की स्वतंत्रता पर हमला
- जनमत का विरोध
- नागरिकों की स्वतन्त्रता पर हमला
- अधिकारियों द्वारा ज्यादतियाँ
- नागरिकों की धार्मिक भावनाओं पर हमला
- मौलिक अधिकारों का हनन
- भारत के संघीय स्वरूप में परिवर्तन
प्रश्न 8. हमारी राजव्यवस्था के निम्नलिखित पक्ष पर आपातकाल का क्या असर हुआ?
- नागरिकों के अधिकारों की दशा तथा नागरिकों पर इसका असर।
- कार्यपालिका और न्यायपालिका के सम्बन्ध।
- जनसंचार माध्यमों के कामकाज।
- पुलिस और नौकरशाही की कार्यवाहियाँ।
उत्तर- 1. नागरिकों के अधिकारों की दशा और नागरिकों पर इसका असर-
आपातकाल की स्थिति में राजव्यवस्था के अनेक पक्षों पर प्रभाव पड़ा। 25 जून 1975 को देश में जब संविध न के अनुच्छेद 352 के तहत आपातकाल स्थिति की घोषणा की गयी तो इसका मौलिक अधि कारों पर असर इस प्रकार से पड़ा कि सभी मौलिक अधिकार को स्थगित कर दिया। जिसके फलस्वरूप उनकी नागरिक के रूप में अनेक सुविधाएँ, अधिकार व स्वतन्त्राएँ समाप्त हो गयी।
नागरिकों के विचारों की अभिव्यक्ति, घूमने फिरने व सभाएँ आयोजित करने पर रोक लगा दी गयी। इस प्रकार से आपातकाल में नागरिकों का जीवन अत्यन्त घुटन का जीवन हो गया सरकार ने निवारक नजरबंदी का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जिसके अन्दर किसी व्यक्ति को इसलिए गिरफ्तार नहीं किया जाता था कि उसने कोई अपराध किया है बल्कि इसलिए कि वह इस आशंका पर कि वह अपराध कर सकता है। आपातकाल के समय में नागरिकों पर अनेक ज्यादतियाँ की गई।
2. कार्यपालिका और न्यायपालिका के सम्बन्ध:
आपातकाल स्थिति की घोषणा का कार्यपालिका व न्यायपालिका के सम्बन्धों पर भी बुरा प्रभाव पड़ा सरकार ने न्यायपालिका के क्षेत्राधिकार में कमी कर दी। उच्च न्यायलयों को अनेक संघीय विषय पर मुदकमें सुनने का अधिकार न रहा व इसी प्रकार से सर्वोच्च न्यायालय से भी प्रान्तीय विषयों से संबंधित मुकदमें सुनने का अधिकार ले लिया।
कई प्रमुख पदों के चुनावों में सर्वोच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार से बाहर कर दिया। अनेक विषयों पर सर्वोच्च न्यायालय की वह उच्च न्यायालय की न्यापुनः शक्ति में कमी कर दी। 42वें संविधान संशोधन के द्वारा न्यायपालिका की शक्तियों में काफी कमियाँ की गई। इंदिरा गाँधी के खिलाफ उच्च न्यायालय इलाहाबाद के निर्णय की पृष्ठ भूमि में भी संविधान में कई संशोधन करके न्यायपालिका की शक्तियों को प्रभावित किया।
3. जनसंचार के माध्यमों के काम काज:
आपातकाल की स्थिति की घोषणा का सबसे अधिक बुरा प्रभाव प्रेस व मीडिया पर पड़ा। आपातकालीन प्रावधानों के अन्तर्गत प्राप्त अपनी शक्तियों पर अमल करते हुए सरकार ने प्रेस की आजादी पर रोक लगा दी। समाचार पत्रों को कहा गया कि वे कुछ भी छापने से पहले छापने की अनुमति ले। इस प्रकार से प्रेस सेंसरशिप लागू कर दी।
अनेक धार्मिक व सांस्कृतिक संस्थाओं जैसे आर.एस.एस. व जमाते इस्लाम पर पाबन्दियाँ लगा दी। अनेक प्रमुख अखबारों इण्डियन एक्सप्रेस और स्टेट्समेन जैसे अखबारों ने इस प्रेस सेंसरशिप का विरोध किया। जो अखबार सरकार के आदेशों का पालन नहीं करते थे उनकी बिजली काट दी जाती थी। कई अखबारों को इन सब कारणों से बन्द करना पड़ा। इसके विरोध में अनेक बुद्धजीवियों ने अपने पदक बापिस कर दिये।
4. पुलिस व नौकरशाही की कार्यवाहियाँ:
आपातकाल के समय में पुलिस व नौकरशाही की भूमिका की सबसे अधिक आलोचना हुई है क्योंकि इन अधिकारियों ने अपनी शक्तियों का व अपनी स्थितियों का दुरूपयोग किया। राजनीतिज्ञों को खुश करने के लए इन्होंने सरकार की गलत नीतियों को भी पूरे जोश के साथ लागू किया।
उदाहरण के तौर पर परिवार नियोजन की नीति व कार्यक्रमों को लागू करने के लिए जबरदस्ती की गई व लोगों की धार्मिक भावनाओं का मजाक उड़ाया गया। पुलिस व नौकरशाही के द्वारा सत्ता का खुला दुरूपयोग किया गया। इनके डर से दिल्ली के गरीब इलाकों के निवासियों को बड़े पैमाने पर विस्थापित होना पड़ा। शहरों के सुन्दरीकरण के नाम पर लोगों के घरों को उजाड़ दिया गया।
प्रश्न 9. भारत की दलीय प्रणाली पर आपातकाल का किस तरह असर हुआ? अपने उत्तर की पुष्टि उदाहरणों से करें।
उत्तर- भारत में बहुदलीय प्रणाली है अर्थात् भारतीय राजनीति में व चुनावी प्रक्रिया में अनेक दल सक्रिय रहते हैं ये दल विभिन्न आधारों पर बनते रहते हैं। इनमें कुछ क्षेत्रीय दल है व कुछ राष्ट्रीय दल है। 1967 तक के चुनावों में सभी दल अलग-अलग चुनाव चिन्हों पर चुनाव लड़ते रहे हैं जिसका लाभ सीधा कांग्रेस को मिलता रहा। 1967 तक के पहले सभी चुनावों का प्रभुत्व रहा। 1967 के चुनावों में पहली बार कछ विरोधी दलों ने मिलकर कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लड़ा परन्तु कांग्रेस के केन्द्र में प्रभुत्व को नहीं तोड़ पायी परन्तु कांग्रेस के जनाधार में कमी अवश्य आ गयी।
राज्यों में कांग्रेस को सरकारें गवानी भी पड़ी। इसके बाद 1971 के मध्याविधि चुनाव में सभी विरोधी दलों ने मिलकर कांग्रेस के खिलाफ विशाल गठबन्धन बनाया परन्तु इन चुनावों में फिर भी कांग्रेस को ही विशाल बहुमत मिला व कांग्रेस इस चुनाव के बाद इंदिरा गाँधी और अधिक शक्तिशाली प्रधानमंत्री के रूप में उभरकर आयी और इस प्रकार से 1971 के चुनाव तक भी कांग्रेस का ही प्रभुत्व रहा। साम्यवादी दल भी अक्सर कांग्रेस के साथ ही रहे।
1975 में देश में आपातकालीन स्थिति लगने के बाद प्रमुख राजनीतिक दलों के नेताओं को जेल में डाल दिया गया व 18 महीने तक सभी राजनीतिक गतिविधियों पर पाबन्दियाँ लगा दी गई। 18 महीने के अन्दर सभी गैर कांग्रेसी नेताओं में कांग्रेस विरोधी व इंदिरा गाँधी विरोधी भावना बढ़ गयी। जैसे ही 1977 में श्रीमती इंदिरा गाँधी ने चुनावों की घोषणा की, सभी विरोधी दलों के नेताओं ने अपने मत-भेद, विचारधारा व कार्यक्रम भुलाकर केवल एक ही कार्यक्रम बनाया कि इस चुनाव में कांग्रेस को हटाया जाये। अतः सभी दलों ने अपने दलों का एक पार्टी में विलय कर जनता पार्टी के नाम से एक दल का निर्माण किया।
इसमें प्रमुख रूप से समाजवादी पार्टी, कांग्रेस ओल्ड, भारतीय लोक दल व भारतीय जन संघ शामिल हुए बाद में बाबू जगजीवन राम के नेतृत्व वाली कांग्रेस फार डेमोक्रेसी पार्टी भी जनता पार्टी में शामिल हो गई। इस प्रकार मुख्य रूप से दो प्रकार के दल इस चुनाव में रहे एक कांग्रेस व साम्यवादी दलों का गठबन्धन व दूसरा जनता पार्टी।
इस प्रकार से आपातकाल स्थिति के अनुभव से भारत में पहली बार दो दलीय प्रणाली के विकास का आभास हुआ। जनता पार्टी एक प्रकार सभी हितों, विचारधाराओं व कार्यक्रमों का प्रतिनिधित्व कर रही थी। चुनावों में जनता पार्टी को भारी सफलता मिली व इसकी सरकार भी बनी परन्तु मात्र 18 महीने में यह जनता पार्टी की सरकार जनता पार्टी के विभाजन के कारण गिर गई व भारत में फिर बहुदलीय प्रणाली का दौर आ गया।
प्रश्न 10. निम्नलिखित अवतरण को पढ़े और इसके आधार पर पूछे गये प्रश्नों के उत्तर दें।
1977 के दौरान भारतीय लोकतन्त्र, दो दलीय व्यवस्था के जितना नजदीक आ गया था उतना पहले कभी नहीं आया। बहरहाल अगले कुछ सालों में मामला पूरी तरह बदल गया। हारने के तुरन्त बाद कांग्रेस दो टूकड़ों में बंट गई जनता पार्टी में भी बड़ी अफरा-तफरी मची। डेविड वटलर, अशोक लाहिडी और प्रणव राय–
(क) किन वजहों से 1977 में भारत की राजनीति दो दलीय प्रणाली के समान जान पड़ रही थी?
(ख) 1977 में दो से ज्यादा पार्टियाँ अस्तित्व में थी। इसके बावजूद लेखकगण इस दौर को दो दलीय प्रणाली के नजदीक क्यों बात रहे हैं?
(ग) कांग्रेस और जनता पार्टी में किन कारणों से टूट पैदा हुई?
उत्तर- (क) 1977 के चुनावों में भारतीय दलीय प्रणाली के स्वरूप में निश्चित रूप से कुछ परिवर्तन नजर आ रहे थे। पहली बार चुनाव मुख्य रूप से दो दलों के बीच हुआ। यद्यपि 1971 के चुनाव में विरोधी दलों ने एक विशाल गठबन्धन बनाकर चुनाव लड़ा था परन्तु 1977 का चुनाव स्पष्ट राय से दो राजनीतिक दलों के बीच लड़ा गया एक कांग्रेस व दूसरी जनता पार्टी जिसमें सभी प्रमुख विरोधी दलों का विलय हो गया था। इस प्रकार 1977 में भारतीय दलीय प्रणाली दो दलीय जान पड़ रही थी।
(ख) निश्चित रूप से 1977 के चुनाव में दो पार्टियाँ अस्तित्व में थी परन्तु इस दौर को इस प्रकार की दो दलीय व्यवस्था नहीं कहा जा सकता जैसी कि ब्रिटेन व अमेरिका में प्रचलित है अतः लेखक ठीक ही कहते हैं कि 1977 में भारत में दलीय प्रणाली दो दलीय प्रणाली के नजदीक अवश्य थी परन्तु स्पष्ट दो दलीय प्रणाली नहीं थी क्योंकि जनता पार्टी एक राजनीतिक दल नहीं था बल्कि कुछ राजनीतिक दलों का मिश्रण था। इसको साधारण भाषा में खिचड़ी कहा जाता था जो 1979 में जनता पार्टी के विभाजन के समय सच भी सिद्ध हो गयी।
(ग) जनता पार्टी कांग्रेस में विभाजन अलग-अलग समय पर अवश्य हुआ परन्तु दोनों में विभाजन के कारण समान ही नजर आते हैं। कांग्रेस में विभाजन 1978 में हुआ जब कांग्रेस के पास सत्ता नहीं थी व जनता पार्टी में विभाजन 1979 में हुआ जब जनता पार्टी सत्ता में तो थी परन्तु विभिन्न पदों के लिए आपसी लड़ाई जारी थी। वास्तव में जनता पार्टी के संगठित राजनीतिक दल के रूप में स्थापित ना हो सकी। आपसी अन्तर विरोध के कारण जनता पार्टी में विभाजन हुआ।
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