4. भारत के विदेश संबंध


प्रश्न 1. इन बयानों के आगे सही या गलत का निशान लगाइये।
(
क) गुट-निरपेक्षता की नीति अपनाने के कारण भारतसोवियत संघ और संयुक्त राज्य अमेरिकादोनों की सहायता हासिल कर सका।
(
ख) अपने पड़ोसी देशों के साथ भारत के सम्बन्ध शुरूआत से ही तनावपूर्ण रहे।
(
ग) शीतयुद्ध का असर भारत-पाक सम्बन्धों पर भी पड़ा।
(
घ) 1971 की शांति और मैत्री की संधि संयुक्त राज्य अमेरिका से भारत की निकटता का परिणाम थी।
उत्तर- (क) सही
(
ख) गलत
(
ग) सही
(
घ) गलत


प्रश्न 2. निम्नलिखित का सही जोड़ा मिलाए–

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उत्तर-

(क) – (2)
(
ख) – (3)
(
ग) – (4)
(
घ) – (1)


प्रश्न 3. नेहरू विदेश नीति के संचालन को स्वतंत्रता का एक अनिवार्य संकेतक क्यों मानते थेअपने उत्तर में दो कारण बताएँ और उनके पक्ष में उदाहरण भी दें।
उत्तर- पंडित जवाहरलाल नेहरू भारत की विदेश नीति के निर्माता माने जाते हैं। वे भारत के प्रधानमंत्री के साथ-साथ भारत के प्रथम विदेशमंत्री भी थे। उनका यह मानना था कि देश की एकता अखंडता के लिए एक दूरदर्शीप्रभावशाली व व्यवहारिक विदेश नीति का निर्माण व इसका सही संचालन अति आवश्यक है।

पंडित जवाहरलाल नेहरू 1949 में संविधान सभा की एक बहस में कहा था कि आजादी बुनियादी तौर पर विदेशी सम्बन्धों से ही बनती है। यही आजादी की कसौटी भी है। बाकी सारा कुछ तो स्थानीय स्वायत्तता है। एक बार विदेशी संबंध अपने हाथ से निकलकर दूसरे के हाथ में चले जाये तो फिर जिस हद तक आपके हाथ से ये संबंध छूटे और जिन मसलों में छूटे-वहाँ तक आप आजाद नहीं रहते।

एक राष्ट्र के रूप में भारत का जन्म विश्वयुद्ध की पृष्ठभूमि में हुआ ऐसे में भारत ने अपनी विदेश नीति में अन्य सभी देशों की सप्रभुत्ता का सम्मान करने और शांति कायम करके अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने का लक्ष्य सामने रखा। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि जिस तरह किसी व्यक्ति या परिवार के व्यवहारों को अंदरी और बाहरी धारक निर्देशित करते हैं उसी तरह एक देश की विदेश नीति पर भी घरेलू व अन्तर्राष्ट्रीय वातावरण का असर पड़ता है।

आपकी विदेश नीति व आपके अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में सम्बन्धों के ऊपर आपकी आर्थिक व राजनीतिक स्वतंत्रता निर्भर करती है। विकासशील देशों के पास अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए संसाधनों का अभाव होता है जिसके लिए उसे विकसित देशों के ऊपर निर्भर रहना पड़ता है अतः उसी के अनुरूप उनको अपनी विदेश नीति भी निश्चित करनी पड़ती है दूसरे विश्व युद्ध के बाद अनेक विकासशील देशों ने ताकतवार देशों की मर्जी के अनुसार अपनी विदेश नीति तय की थी।


प्रश्न 4. “विदेश नीति का निर्धारण घरेलू जरूरत और अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थितियों के दोहरे दबाव में होता है।” 1960 के दशक में भारत द्वारा अपनाई गई विदेश नीति से एक उदाहरण देते हुए अपने उत्तर की पुष्टि करें।
उत्तर- निश्चित रूप से विदेश नीति के निर्माण में अन्तरिक व वाह्य परिस्थितियाँ प्रमुख रूप में निर्धारण का काम करती है। किसी भी देश की विदेशी नीति के निम्न प्रमुख तत्व होते हैं –

  1. राष्ट्रीय हित
  2. देश की जनसंख्या व विचारधारा
  3. आर्थिक परिस्थितियाँ
  4. कृषि व उद्योग विकास की स्थिति
  5. विज्ञान व तकनीकी विकास
  6. भौगोलिक व सामरिक स्थिति

उपरोक्त आन्तरिक तत्वों के अलावा अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थितियाँ भी किसी देश की विदेश नीति के निर्धारण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं जिनमें निम्न हैं–

  1. अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर तनाव
  2. अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर महत्त्वपूर्ण मुद्दे
  3. अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग
  4. विचारधारा का प्रभुत्व
  5. सामूहिक विषय जैसे आंतकवाद मानव अधिकार व पर्यावरण की समस्या आदि
  6. अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर युद्ध का खतरा
  7. अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर गुटबाजी

1960 के दशक में भारत की स्थिति आन्तरिक स्तर पर भी व अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भी खराब थी। भारत कृषि के क्षेत्र में व उद्योग के क्षेत्र में भी पिछड़ा हुआ था। नियोजित अर्थव्यवस्था के आधार पर आर्थिक विकास के कार्य में लगा था जिसके लिए उसको अन्य देशों की आर्थिक व वैज्ञानिक सहायता की आवश्यकता थी।

अपनी आवश्यकता को पूरा करने के लिए भारत के पास प्रयाप्त अनाज पैदा करने की क्षमता नहीं थी। बेरोजगारी व गरीबी देश में व्याप्त थी। आर्थिक विकास के लिए वैज्ञानिक व तकनीकी मदद की आवश्यकता थी। इन सभी आन्तरिक स्थितियों ने भारत की विदेश नीति को प्रभावित किया। इसी प्रकार से अन्तर्राष्ट्रीय तत्वों ने भी भारत की विदेश नीति को प्रभावित किया। विदेश नीति के दो प्रमुख उद्देश्य थे प्रथम राष्ट्र की एकता व अखंडता को निश्चित करना व दूसरे आर्थिक विकास प्राप्त करना।

उस समय अर्थात् 1960 के दशक में दुनिया दो गुटों में बँटी थी कि अमेरिका का गुट व दूसरा सोवियत संघ के नेतृत्व का गुट। दोनों अपना-अपना प्रभाव बढ़ा रहे थे। अतः उनके प्रभाव से बंधने के लिए गुट निरपेक्षता की नीति को अपनाया व राष्ट्रीय एकता अखंडता को निश्चित करने के लिए पंचशील का सिद्धांत व संयुक्त राष्ट्र का ना केवल प्रारम्भिक सदस्य बना बल्कि विश्व शांति को बढ़ाना अपनी विदेश नीति का प्रमुख उद्देश्य बनाया।


प्रश्न 5. अगर आपको भारत की विदेश नीति के बारे में फैसला लेने के लिए कहा जाये तो आप इसकी किन दो बातों को बदलना चाहेंगे। ठीक उसी तरह यह भी बताएं कि भारत की विदेश नीति के किन दो पहलुओं को आप बरकरार रखना चाहेंगे। अपने उत्तर के समर्थन में तर्क दीजिए।
उत्तर- भारत की विदेश नीति के सम्बन्ध में निर्णय लेने के सन्दर्भ में निम्न दो बातों को बदला जा सकता है–

  1. परमाणु नीति
  2. निःशस्त्रीकरण

भारत की विदेश नीति के प्रमुख निर्धारक तत्वों में भारत की परमाणु नीति व निशस्त्रीकरण का समर्थन दो प्रमुख तत्व रहे हैं। अब समय आ गया है कि इन विषयों के सम्बन्ध में आज की परिस्थितियों की माँग के अनुसार कुछ आवश्यक बदलाव लाये जाये। भारत की परमाणु नीति रही है कि भारत परमाणु शक्ति का प्रयोग केवल शान्तिपूर्ण उद्देश्यों के लिए ही करेगा व किसी भी परमाणु हथियार बनाने व उन्हें युद्ध के लिए प्रयोग करने का कार्य नहीं करेगा।

परंतु आज के युग में ना केवल पाँच सदस्यों अर्थात् अमेरिकासोवियत संघचीनब्रिटेन व फ्रांस के पास परमाणु बम है अथवा बम बनाने की क्षमता है बल्कि अन्य और विकसित देशों जैसे इजराइलजर्मनकोरियाइन्डोनेशियाब्राजील व पाकिस्तान के पास भी या तो बम है अथवा परमाणु बम बनाने की क्षमता है। यह तो निश्चित है कि इन नई परमाणु शक्तियों के पास परमाणु शक्ति का युद्ध के लिए प्रयोग करने की योजनाएँ हैं इस स्थिति में भारत को अपनी परमाणु क्षमता बनाने व दिखाने की आवश्यकता है जिसके लिए उसे अपनी विदेश नीति में बदलाव करना चाहिए।

दूसरे शस्त्रीकरण का सम्बन्ध शस्त्रों के बनाने व उसके खरीदने की स्थिति से हैयद्यपि भारत ने इसका विरोध किया है परंतु जब हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान में चीन व अमेरिका से शस्त्र खरीदकर हमारे खिलाफ प्रयोग किये जा रहे हैं तो इसे भी इस नीति को बदलकर अपनी रक्षा के लिए शस्त्र खरीदने चाहिए। जिन विषयों को हम बनाये रखना चाहेंगे वे हैं –

  1. गुट निरपेक्षता का सिद्धांत
  2. पंचशील का सिद्धांत क्योंकि ये दोनों सिद्धांत सदा प्रांसागिक रहेंगे।

प्रश्न 6. निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए:
 (
क) भारत की परमाणु नीति।
 (
ख) विदेश नीति के मामलों में सर्व-सहमति
उत्तर- (क) भारत की परमाणु नीति:
भारत के प्रथम प्रधानमंत्री श्री जवाहरलाल नेहरू भारत की विदेश नीति के निर्माता थे। वे विश्व शांति में सबसे बड़े समर्थक थे अतः उन्होंने परमाणु ऊर्जा के लड़ाई व युद्ध में प्रयोग करने के किसी भी स्तर पर प्रयास करने का विरोध किया। भारत की विदेश नीति में भी उन्होंने यह निश्चित किया कि भारत परमाणु ऊर्जा का प्रयोग केवल विकास कार्यों व शांति के लिए ही करेगा।

भारत की परमाणु ऊर्जा के संस्थापक डॉ. भावा थे जिन्होंने पंडित नेहरू के निर्देश पर परमाणु ऊर्जा का शांति के प्रयोग करने के लिए अनेक अनुसंधान किए। भारत ने 1974 में प्रथम परमाणु परीक्षण किया जिसके फलस्वरूप दुनिया के अनेक देशों ने भारत के खिलाफ प्रतिकूल प्रतिक्रिया की।

भारत सदैव परमाणु ऊर्जा के शान्तिपूर्ण क्षेत्र में प्रयोग का ही समर्थक रहा व विश्व के देशों पर परमाणु विस्फोट रोकने के लिए एक व्यापक संधि के लिए जोर डाला। भारत ने परमाणु प्रसार के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए की गई संधियों का विरोध किया क्योंकि ये संधियाँ पक्षपातपूर्ण थी।

इसी कारण से भारत ने 1995 में बनी (सी.टी.-बी.टी.) व्यापक परमाणु निरीक्षण प्रतिबंध संधि पर हस्ताक्षर नहीं किये। 1998 में भारत में फिर परमाणु विस्फोट किये। अब परमाणु ऊर्जा के सम्बन्ध में भारत की नीति यह है कि भारत परमाणु ऊर्जा का प्रयोग शांति के लिए करेगा लेकिन आत्म रक्षा के लिए परमाणु क्षमता बनाने का अपना विकल्प खुला रखेगा।

(ख) विदेश नीति के मामले पर सर्वसहमति:
भारत की विदेश नीति की यह विशेषता रही है कि भारतीय विदेश नीति के निश्चित मूल तत्व रहे हैं सरकार व विरोधी दलों व अन्य जनमत निर्माण करने वाले वर्गों के बीच इन तत्वों पर आमतौर से सहमति रही है अगर इन तत्वों में किसी प्रकार का परिवर्तन करने की जरूरत पड़ी तो उस पर भी आम राय अर्थात् आम सहमति बनी। जैसे परमाणु शक्ति के प्रयोग के सम्बन्ध में व परमाणु परीक्षण करने के सम्बन्ध में आम सहमति रही। पंचशील गुट निरपेक्षतापड़ोसियों के साथ सम्बन्ध व बड़ी शक्तियों के साथ सम्बन्धों पर आमतौर से सर्व सहमति रही है।


प्रश्न 7. भारत की विदेश नीति का निर्माण शांति और सहयोग के सिद्धांतों को आधार मानकर हुआ। लेकिन 1962 से 1972 की अवधि यानि महज दस सालों में भारत को तीन युद्धों का सामना करना पड़ा। क्या आपको लगता है कि यह भारत की विदेश नीति की असफलता है अथवा आप इसे अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों का परिणाम मानेंगेअपने मंतव्य के पक्ष में तर्क दीजिए।
उत्तर- भारत को विदेश के निर्माता पंडित जवाहरलाल नेहरू थे। वे प्रधानमंत्री के साथ-साथ भारत के विदेश मंत्री भी थे। उनके अनुसार भारत की विदेश नीति का उद्देश्य राष्ट्रीय एकता व अखंडता को सुरक्षित करना व भारत का आर्थिक विकास निश्चित करना था। इस उद्देश्य के अनुरूप भारत के विदेशों से सम्बन्धों का निर्धारण किया। पंचशील व गुट निरपेक्षता के सिद्धांतों को अपनाया गया।

दुर्भाग्यवश भारत को 1962 से लेकर 1972 के दशक में तीन युद्धों को झेलना पड़ा जिससे भारत की अर्थव्यवस्था पर बुरा प्रभाव पड़ा। 1962 में चीन के साथ युद्ध हुआ, 1965 में भारत को पाकिस्तान के साथ युद्ध करना पड़ा व तीसरा युद्ध 1971 में भारत को पाकिस्तान के साथ ही करना पड़ा। यह सच है कि भारत को 1962 से 1972 के दशक में तीन युद्धों का सामना करना पड़ा परंतु यह नहीं कहा जा सकता कि ये भारत की विदेश नीति भी असफलता का परिणाम था। भारत ने चीन के साथ 1954 में पंचशील का समझौता किया चीन ने इस समझौते को तोड़ा तो यह चीन के द्वारा किया गया विश्वासघात था।

चीन ने एक बड़ा भारत का हिस्सा अपने कब्जे में ले लिया परंतु बाद में भी वह अपनी पुरानी सीमा पर बापिस चला गया। धीरे-धीरे भारत व चीन के सम्बन्धों में फिर सुधार हो गया। इसी प्रकार से भारत व पाकिस्तान के बीच कश्मीर के गुद्दे पर तनाव व मतभेद 1948 से ही लगातार रहे जो 1965 में युद्ध के रूप में बदल गया।

1971 में बंगलादेश व पाकिस्तान के बीच आपसी समस्या में भारत के हस्तक्षेप के कारण 1971 का युद्ध हुआ। भारत व पाकिस्तान के बीच सम्बन्ध अब धीरे-धीरे सुधर रहे हैं। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि 1962-1972 के बीच तीन युद्ध भारत की विदेश नीति की असफलता नहीं बल्कि तत्कालीन परिस्थितियों का ही परिणाम है।


प्रश्न 8. क्या भारत की विदेश नीति से झलकता है कि क्षेत्रीय स्तर की महाशक्ति बनना चाहता है? 1971 के बंगलादेश युद्ध के संदर्भ में इस प्रश्न पर विचार करें।
उत्तर- भारत की विदेश नीति के किसी भी तत्व से यह नहीं झलकता कि भारत अपने क्षेत्र में प्रभुत्व जमाकर क्षेत्रीय महाशक्ति बनना चाहता है। भारत की विदेश नीति के दो प्रमुख तत्वों नं. पंचशील नं. पड़ोसी देशों के साथ अच्छे सम्बन्ध बनाने की नीति के अनुसार भारत का यह सिद्धांत है कि कोई भी किसी अन्य के अन्दरूनी मामले में हस्तक्षेप नहीं कर वे अपासी सहयोग को बढ़ाये।

साथ-साथ पंचशील का यह भी सिद्धांत है कि सभी एक-दूसरे की राष्ट्रीय एकता अखंडता व प्रभुसत्ता का सम्मान करे तथा एक-दूसरे पर आक्रमण ना करे। शांतिपूर्ण सह अस्तित्व का सिद्धांत भी भारतीय विदेश नीति का प्रमुख तत्व है। गुट निरपेक्षता का उद्देश्य यह है कि तृतीय विश्व के देशों की राष्ट्रीय एकता व अखंडता सुरक्षित रहे व आर्थिक विकास में सभी तृतीय विश्व के विकासशील व अविकसित देश आपस में सहयोग करें।

1971 के बंगलादेश के संदर्भ में ऐसा कहा जाता रहा है कि भारत ने पाकिस्तान के आन्तरिक मामले में हस्तक्षेप करके पाकिस्तान का विभाजन कराया व इस क्षेत्र में अपना दबदबा बनाना चाहता है। भारत के कई ऊँचे प्रमुख देश जैसे श्रीलंका नेपाल भी कुछ ऐसा ही सोचने लगे हैं परंतु सच्चाई यह नहीं है। भारत ईमानदारी के साथ गुटनिरपेक्षता के सिद्धांत व पंचशील के सिद्धांत पर चल रहा है।

भारत ने सार्क (दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संगठन) के गठन व विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अतः यह कहना गलत है कि भारत ने एक क्षेत्रीय शक्ति के रूप में व्यवहार किया है। बंगलादेश में भारत ने मानवीय आधारों पर हस्तक्षेप किया व सार्क के सभी देशों के साथ विशेषकर छोटे राज्यों जैसे नेपालभूटान व मालद्वीप जैसे देशों के साथ बड़े भाई की भूमिका निभाई है।


प्रश्न 9. किसी देश का राजनीतिक नेतृत्व किस तरह से उस राष्ट्र की विदेश नीति पर असर डालता हैभारत की विदेश नीति का उदाहरण देकर इस प्रश्न पर विचार कीजिए।
उत्तर- किसी देश की विदेश नीति के कुछ निश्चित निर्धारक तत्व होते हैं जिनका सम्बन्ध उस देश की आन्तरिक स्थिति जैसेसामाजिक आर्थिक स्थितिवैज्ञानिक तकनीकी विकासभौगोलिक सामरिक स्थितिविचारधारासैनिक शक्ति व संधि-समझौते पर निर्भर करती है व साथ अन्तर्राष्ट्रीय स्थिति व अन्तर्राष्ट्रीय वातावरण पर निर्भर करती है परंतु देश का शासक दल व उसका नेता भी उस देश की विदेश नीति को निश्चित रूप से प्रभावित करता है भारत के सन्दर्भ में भी हम इस तथ्य को समझ सकते हैं।

भारत के प्रथम प्रधानममंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू प्रधानमंत्री के साथ-साथ देश के विदेश मंत्री भी रहे। भारत की विदेश नीति पर पंडित जवाहरलाल नेहरू के विचारों कीप्राथमिकताओं की दृष्टिकोणों की व व्यक्तित्व की इतनी अधिक छाप है कि उन्हें भारत की विदेश नीति का निर्माता कहा जाता है। 1947 से 1964 तक भारत के प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू रहे।

उन्होंने भारत की गुट निरपेक्षता के सिद्धांतों के आधार पर सभी देशों व महाशक्तियों के साथ बराबर के सम्बन्ध रखें। उन्होंने भारत के विकास में सोवियत संघ का भी सहयोग लिया व अमेरिका से भी मदद ली। परंतु इंदिरा गाँधी के प्रधानमंत्री बनाने के बादभले ही भारत की विदेश नीति के मूल सिद्धांत वही रहे परंतु इंदिरा गाँधी ने भारतीय सम्बन्धों को सोवियत संघ की ओर अधिक मोड़ दिया व 1971 में सोवियत संघ के साथ संधि की।

जनता पार्टी की सरकार के प्रधानमंत्री रहे श्री मोरारजी देशाई के समय में भारतीय सम्बन्धों का रूप अमेरिका की ओर रहा। इसी प्रकार परमाणु ऊर्जा के प्रयोग के लिए भारत की सदैव यह नीति रही कि परमाणु परीक्षण नहीं करेंगे व परमाणु शक्ति का प्रयोग केवल शान्तिपूर्ण उपयोग के लिए किया जायेगा परंतु एन. डी. ए. की सरकार में प्रधानमंत्री रहे श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इस नीति में व्यापक परिवर्तन कर 1998 में कई परमाणु परीक्षण किये। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि किसी देश की विदेश नीति उसके नेतृत्व पर भी निर्भर करती है।


प्रश्न 10. निम्नलिखित अवतरण को पढ़ें और इसके आधार पर पूछे गये प्रश्नों के उत्तर दीजिए:

गुट निरपेक्षता का व्यापक अर्थ है अपने को किसी भी सैन्य गुट में शामिल ना करना …… इसका अर्थ होता है चीजों को यथासंभव सैन्य दृष्टिकोण से न देखना और इसको कभी जरूरत आन पड़े तब भी किसी सैन्य गुट के नजरिये को अपनाने को जगह स्वतंत्र रूप से स्थिति पर विचार करना तथा सभी देशों के साथ दोस्ताना रिश्ते कायम करना …… जवाहरलाल नेहरू

(क) नेहरू सैन्य गुटों से दूरी क्यों बनाना चाहते थे?
(
ख) क्या आप मानते हैं कि भारत-सोवियत मैत्री की संधि से गुट निरपेक्षता के सिद्धांतों का उलंघन हुआअपने उत्तर के समर्थन में तर्क दीजिए।
(
ग) अगर सैन्य गुट न होते तो क्या गुटनिरपेक्षता की नीति बेमानी होती?

उत्तर- (क) पंडित जवाहरलाल नेहरू गुट निर्पेक्ष आंदोलन के संस्थापक थे। गुटनिर्पेक्ष आंदोलन का उद्देश्य एशिया अफ्रीका व लेटिन अमेरिका के देशों को अमेरिका व सोवियत संघ के सैनिक गठबंधनों (नेटो व वार्षा सन्धि) से अलग रखना था ताकि इन देशों की स्वतंत्रताराष्ट्रीय एकता व अखंडता को किसी प्रकार का कोई नया खतरा पैदा हो।

सोवियत संघ व अमेरिका इन नये स्वतंत्र देशों को अपने-अपने प्रभाव में लाने का प्रयास कर रहे थे जिसके लिए उन्होंने सैनिक गठबंधन बनाये थे। पंडित नेहरू ने इन नये स्वतंत्र देशों को गुट निरपेक्षता की नीति के माध्यम से यह समझाने का प्रयास किया कि किसी सैनिक गठबंधन की सदस्यता लेने पर उनकी स्वतंत्रता खतरे में पड़ सकती है। गुट निरपेक्षता का उद्देश्य इन नये देशों में आपसी सहयोग को बढ़ाना था।

(ख) अगस्त 1971 में भारत ने सोवियत संघ के साथ मित्रता व सहयोग की सन्धि की जो किसी भी प्रकार का कोई सैनिक समझौता नहीं था। इस प्रकार के सहयोग के समझौते तो भारत व अमेरिका के बीच भी चल रहे थे। अत: सोवियत संघ के साथ यह समझौता गुटनिरपेक्षता के सिद्धांत का उलंघन नहीं करता। यह समझौता समय की कसौटी पर खरा उतारा। 1971 (दिसम्बर) को जब भारत व पाकिस्तान के युद्ध के दौरान अमेरिका ने अपना सातवाँ बेडा बंगाल की खाड़ी में भेजा तो सोवियत संघ ने इसका जवाब दिया जिससे अमेरिका को पीछे हटना पड़ा।

(ग) अगर सोवियत संघ व अमेरिका के सैन्य गुट ना बनते तो हो सकता है कि गुटनिरपेक्ष आंदोलन का यह स्पष्ट रूप न होता। परंतु यह तो निश्चित ही है कि द्वितीय विश्व के बाद दुनिया दो गुटों में बँट गयी थी। एक साम्यवादी गुट जिसका नेतृत्व सोवियत संघ कर रहा था व दूसरा पूँजीवादी गुट जिसका नेतृत्व अमेरिका कर रहा था।

दोनों ही गुट अपना-अपना प्रभाव इन क्षेत्रों पर बढ़ाने के लिए आर्थिक मदद की पेशकश कर रहे थे। अत: इस सन्दर्भ में भी गुटनिरपेक्षता का सिद्धांत प्रासांगिक है। गुटरिपेक्षता के सिद्धांत का उद्देश्य यह भी है कि निर्णय विषय की योग्यता पर किया जाये व मान सम्मान व उचित शर्तों पर किसी से सहायता ली जाये।