7. परीक्षोपयोगी कहावतें (लोकोक्तियां)


1. अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता - अकेला व्यक्ति कुछ नहीं कर सकता


2. अधजल गगरी छलकत जाय - थोड़ी विद्या या धन पाकर इतराना


3. अन्धे के हाथ बटेर लगना - विना परिश्रम के सफलता मिलना


4. अपना हाथ जगन्नाथ - स्वयं द्वारा संपन्न कार्यफलदायी होता है


5. अपनी करनी-पार उतरनी - अपने कर्म का फल स्वयं भोगना पड़ता है


6. अपनी गली में कुत्ता भी शेर होता है। - अपने घर में निर्बल भी सबल दिखायी पड़ता है


7. अपनी-अपनी डफली अपना-अपना राग - सबका मत पृथक् पृथक् होना


8. अब पछताये होत का जब चिड़िया चुग गयी खेत - समय निकल जाने पर पछताना, समय निकल जाना


9. अशर्फियां लुटे, कोयलों पर पहरा - मूल्यवान की अपेक्षा तुच्छ वस्तु का ध्यान, अल्प व्यय पर सतर्कता


10. आंख के अन्धे नाम नयनसुख - गुण के विपरीत नाम


11. आ बैल ! मुझे मार - जान-बूझकर मुसीबत मोल लेना


12. आगे कुआं पीछे खाई - चारों ओर कठिनाई-ही-कठिनाई


13. आगे नाथ न पीछे पगहा - जिसका कोई न हो


14. आप भला तो जग भला - सभी का अपने-जैसा दिखायी देना


15. आम के आम गुठलियों के दाम - दोहरा लाभ


16. आये थे हरिभजन को ओटन लगे कपास - प्रमुख कार्य के उद्देश्य को छोड़कर महत्वहीन में लग जाना


17. आसमान से गिरा खजूर पर अटका - एक आफ़त से छूटकर दूसरी आफ़त में फंसना


18. उलटा चोर कोतवाल को डांटे - दोषी व्यक्ति निर्दोष पर दोष लगाये


19. ऊँची दूकान फीका पकवान - दिखावा ही दिखावा; आडम्बर-ही-आडम्बर


20. ऊँट के मुंह में जीरा - 'नहीं' के बराबर अत्यल्प


21. एक अनार-सौ बीमार - साधन एक मांगने वाले अनेक


22. एक तो चोरी दूजे सीना जोरी - अपराध स्वीकार न करके रोब गांठना


23. एक हाथ से ताली नहीं बजती - दोस्ती या लेनदेन में दोनों पक्ष की सहमति होनी चाहिए


24. ओखली में सिर दिया तो मूसलों से क्या डरना - कार्य आरम्भ करने पर अंजाम की परवाह न करना


25. क़ब्र में पांव लटकना - मृत्यु के क़रीब होना


26. कहां राजा भोज, कहां गंगू तेली - दो असमान व्यक्तियों की तुलना


27. का वर्षा जब कृषी सूखानी - अवसर निकल जाने पर सहायता देना व्यर्थ


28. काठ की हांड़ी बार-बार नहीं चढ़ती - कपटपूर्ण व्यवहार एक बार ही चलता है


29. काला अक्षर भैंस बराबर - अनपढ़ मनुष्य


30. कोठीवाला रोवे छप्परवाला सोवे - अधिक धन चिन्ता का कारण होता है


31. कोयले की दलाली में हाथ काले - बुरी संगति में कलंक लगता है


32. खग जानै खग की भाषा - जो जिस संगति में रहता है, वह उसका पूरा भेद जानता है


33. खेत खाय गदहा मार खाये जुलहा - निरपराध को दण्डित करना


34. खोदा पहाड़ निकली चुहिया - अधिक परिश्रम के बाद अत्यन्त साधारण


35. गुड़ खाय गुलगुलों से परहेज - झूठा ढोंग रच


36. चमड़ी जाय पर दमड़़ी न जाय - अत्यधिक कंजूस


37. चलती का नाम गाड़ी - सफलता से यश मिलता है


38. चार दिन की चाँदनी फिर अंधेरी रात - प्रसन्नता का समय अल्प होता है


39. चोर-चोर मौसेरे भाई - दुष्टों के बीच मित्रता होना


40. चोर की दाढ़ी में तिनका - अपराधी सदैव सशंक रहता है


41. छछून्दर के सिर में चमेली का तेल - अयोग्य अथवा अपात्र को अच्छी वस्तु की प्राप्ति


42. जल में रहकर मगर से बैर - आश्रयदाता से शत्रुता नहीं रखनी चाहिए


43. जस दूल्हा तस बनी - बाराता बुरे को बुरों का साथ मिलना


44. जान है तो जहान है - अपने जीते-जी ही सच कुछ है


45. जिस पत्तल में खाना, उसी में छेद करना - किये का उपकार न मानना


46. जैसी करनी वैसी भरनी - कर्म के अनुसार फल की प्राप्ति


47. डूबते को तिनके का सहारा - संकट के समय थोड़ी सी सहायता पर्याप्त होती है


48. थोथा चना, बाजे घना - असमर्थ व्यक्ति अधिक बात करता है; महत्त्वहीन को आडम्बर की आवश्यकता होती है


49. दाल-भात में मूसलचन्द - दो के बीच में तीसरे का बिना काम के घुस जाना, खलल डालना


50. दुधारु गाय की लात भली - जिससे लाभ हो, दो-चार खरी-खोटी भी बुरी नहीं लगती


51. दुविधा में दोऊ गये, माया मिली न राम - एक साथ दो कार्य नहीं हो सकते


52. दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंक कर पीता है - एक बार की हानि भविष्य के लिए सचेत कर देती है 


53. दोनों हाथ में लड्डू होना - दोनों ओर लाभ-ही-लाभ होना


54. न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी - कारणों को नष्ट कर देना


55. नाच न जाने आंगन टेढ़ा - काम न जानने पर झूठा वहाना बनाना


56. नीम हकीम ख़तरे जान - अल्पज्ञ से सदा ख़तरे की आशंका 


57. नौ नगद न तेरह उधार - जो कुछ नक़द मिले, बहुत अच्छा है।


58. पेट पर लात मारना - भुखमरी की दशा होना


59. बन्दर क्या जाने अदरक का स्वाद - गुणवान् ही गुणों को पहचानता है


60. बिल्ली के गले में घण्टी बांधना - खुद को संकट में डालना 


61. भागते भूत की लंगोटी भली - जहां से कुछ मिलने की आशा न हो वहां से जो कुछ मिले, वही बहुत है


62. बोया पेड़ बबूल का आम कहां से होय - बुरे काम का फल बुरा ही होता है


63. भैंस के आगे बीन बजाना – बुद्धिहिन् को उपदेश देना 


64. मानो तो देव, नहीं तो पत्थर - विश्वास ही सब कुछ है


65. मुंह में राम बगल में छुरी - ऊपर से मीठा परन्तु हृदय में कपट रखना


66. लातों के देवता बातों से नहीं मानते - दुष्ट बिना ताड़ना के ठीक नहीं होते


67. सब धान बाईस पसेरी - सभी के साथ एक-जैसा व्यवहार


68. सांप-छछून्दर की गति होना - असमंजस की स्थिति में पड़ना


69. सांप भी मर जाए, लाठी भी न टूटे - काम निकल जाए और हानि भी न हो


70. सिर मुड़ाते ही ओले पड़ना - कार्य के प्रारम्भ में ही विघ्न पड़‌ना


71. सौ सोनार की एक लोहार की - निर्बल की सौ चोटों की अपेक्षा बलवान की एक चोट काफ़ी होती है 


72. हरें लगे न फिटकरी रंग चोखा होय - खर्च भी न हो और बात भी बन जाए 


73. होनहार बिरवान के होत चीकने पात - महान् व्यक्ति के लक्षण बचपन से ही प्रकट होने लगते हैं