| 9. भारतीय राजनीति : एक बदलाव |
प्रश्न 1. उन्नी मुन्नी ने अखबार की कुछ कतरनों को बिखेर दिया। आप इन्हें कालक्रम के अनुसार व्यवस्थित करें।
- मंडल आयोग की सिफारिश और आरक्षण विरोधी हंगामा
- जनता दल का गठन
- बाबरी मस्जिद का विध्वंस
- इंदिरा गांधी की हत्या
- राजग सरकार का गठन
- गोधरा की दुर्घटना और उसके परिणाम
- संप्रग का गठन
उत्तर-
- इंदिरा की हत्या – 1984
- जनता दल का गठन – 1989
- मंडल आयोग की सिफारिश और आरक्षण विरोधी हंगामा – 1990
- बाबरी मस्जिद का विधवंश – 1992
- राजग सरकार का गठन – 1999
- गोधरा की दुर्घटना और उसके परिणाम – 2002
- सप्रंग का गठन – 2004
प्रश्न 2. निम्नलिखित में मेल करें
उत्तर-
(क) – (4)
(ख) – (2)
(ग) – (1)
(घ) – (3)
प्रश्न 3. 1989 के बाद की अवधि में भारतीय राजनीतिक के मुख्य मुद्दे क्या रहे? इन मुद्दों से राजनीतिक दलों के आपसी जुड़ाव के क्या रूप सामने आए हैं?
उत्तर- 1989 के चुनाव में भ्रष्टाचार का मुद्दा मुख्य था जिसके आधार पर नव गठित जनता दल की सरकार बनी जिसमें श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधानमन्त्री बने। जनता दल व इसके सहयोगी दलों ने राष्ट्रीय मोर्चा बनाया परन्तु राष्ट्रीय मोर्चा को भी पूर्ण बहुमत प्राप्त नहीं हुआ अतः राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार को दो विरोधी विचारधारा रखने वाली पार्टियों भारतीय जनता पार्टी व वामपंथी दलों ने बाहर से समर्थन दिया। यह व्यवस्था अधिक समय तक सुचारू रूप से ना चल सकी व जल्द ही इसमें मतभेद उभर कर सामने आने लगे।
विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार द्वारा मंडल कमीशन की सिफारिशों के आधार पर अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों के लिए शिक्षण संस्थाओं व रोजगार में 27 प्रतिशत आरक्षण लागू करने से भारतीय राजनीति में एक बड़ा तूफान सा आया जिसने आरक्षण की राजनीतिक के आधार पर अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों में राजनीतिक जागरूकता का विकास कर राजनीतक सत्ता में एक नए संघर्ष को जन्म दे दिया। पिछड़े वर्ग की जो राजनीति दक्षिण में चल रही थी वह अब उत्तर भारत में भी प्रारम्भ हो गई जिसके आधार पर कई राज्यों कई क्षेत्रीय दलों का गठन किया गया। इस प्रकार से 1989 के बाद भारतीय राजनीति में आरक्षण व अन्य पिछड़ा वर्ग का राजनीतिकरण एक प्रमुख मुद्दा उभर कर सामने आया।
आरक्षण के अलावा जो दूसरा मुद्दा भारतीय राजनीति में उभर कर आया वह था बाबरी मस्जिद विवाद जिसको 6 दिसम्बर 1992 में लाखों की संख्या में पहुँचे हिन्दू कट्टर पंथियों ने ध्वस्त कर दिया था व इसके बाद उत्तर प्रदेश की सरकार को केन्द्र ने बर्खास्त कर दिया। परन्तु इस घटना में साम्प्रदायिक हिंसा व तनाव रहा। इस पूरे घटना चक्र से धार्मिक ध्रुवीकरण हुआ जिसका परिणाम 2002 में गोधरा कांड व गुजरात में मुसलमानों की नियोजित तरीके से की गई हत्याएँ। इस पूरे घटना चक्र ने हिन्दू ध्रुवीकरण किया जिसका लाभ भारतीय जनता पार्टी को 1996 के चुनाव में मिला। तीसरा महत्त्वपूर्ण परिवर्तन भारतीय राजनीति में हुआ कि राष्ट्रीय दलों का घटता हुआ प्रभाव जिसने गठबन्धन की राजनीति को जन्म दिया।
प्रश्न 4. “गठबन्धन की राजनीति के इस नए दौर में राजनीतिक दल विचारधारा को आधार मानकर गठजोड़ नहीं करते” इस कथन के पक्ष में आप कौन-से तर्क देंगे।
उत्तर- वैसे तो 1977 में जनता पार्टी की सरकार भी एक गठबन्धन की ही सरकार थी क्योंकि इसमें कई राजनीतिक दलों के विलय होकर जाता पार्टी का गठन किया था परन्तु 1989 में गठबन्धन की राजनीति का युग अधिक स्पष्ट रूप से सामने आया है जो आज तक भी जारी है। जनता पार्टी में घटकदलों ने विलय के बाद अपना अस्तित्व समाप्त कर दिया था परन्तु 1989 के बाद गठबन्धनों की सरकार में प्रायः एक राष्ट्रीय दल व अन्य क्षेत्रीय दल शामिल है जिसमें कोई भी दल अपने अस्तित्व को समाप्त नहीं करता। जनता पार्टी की सरकार केवल 1979 तक ही चली जबकि 1996 के बाद अब गठबन्धन सरकारें लगातार चल रही हैं।
गठबन्धन के इस नए दौर में विशेष बात यह है कि हलाँकि राजनीतिक दल गठबन्धन सरकार बनाने के लिए अपना अस्तित्व तो समाप्त नहीं करते परन्तु अपनी विचारधाराओं को या तो नई परिस्थितियों के अनुसार समायोजित कर लेते है। जिन पर सभी दलों, घटकों की सहमति होती है जिसे न्यूनतम साझा कार्यक्रम कहते हैं। एन.डी.ए. की सरकार चलाने के लिए भारतीय जनता पार्टी (जो सबसे बड़ा घटक था) ने अपनी विचारात्मक मसलों जैसे कश्मीर का अनुच्छेद 370, बाबरी मस्जिद मसला व यूनिफार्म सिविल कोड़ को न्यूनतम साझा कार्यक्रम से अलग रखकर सभी दलों की अन्य विषयों पर सहमति व सहयोग प्राप्त किया। इस कारण एन.डी.ए. की सरकार पूरे पाँच वर्ष चली।
इसी प्रकार से 2004 में यू.पी.ए. का गठन किया गया जिसमें कांग्रेस सबसे बड़ा राष्ट्रीय दल है व अन्य दल सभी क्षेत्रीय राजनीतिक दल हैं। यू.पी.ए. को बाहर से वामपंथियों का समर्थन है। इस गठबन्धन में अलग-अलग विचारों के राजनीतिक दल है जैसे ऐसे अनेक विषय हैं जिस पर कांग्रेस व वामपंथी दल गम्भीर मतभेद रखते हैं व जो सामने भी आए हैं। जैसे उदारीकरण की नीति पर निजीकरण की प्रक्रिया पर व हाल ही में नाभकीय समझौते को लेकर। परन्तु सभी दलों में न्यूनतम साझा कार्यक्रम पर सहमति है जिसके आधार पर गठबन्धन सरकार 2014 तक चली।
प्रश्न 5. आपातकाल के बाद के दौर में भाजपा एक महत्त्वपूर्ण शक्ति के रूप में उभरी। इस दौर में इस पार्टी के विकास क्रम का उल्लेख करें।
उत्तर- भारतीय जनता पार्टी वास्तव में जनवरी 1980 में अस्तित्व में आयी। इससे पहले यह भारतीय जनसंघ के नाम से जानी जाती थी। आपातकाल में जनसंघ के भी प्रमुख नेता व कार्यकर्ता जेल में बंद थे। जनता पार्टी के गठन की प्रक्रिया में जनसंघ ने भी सक्रिय व महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जय प्रकाश नारायण के परामर्श व आशीर्वाद से तत्कालीन प्रमुख विरोधी दलों ने अपने-अपने दलों का एक-दूसरे में विलय कर जनता पार्टी का गठन किया। भारतीय जनसंघ जो कि एक हिन्दुवादी पार्टी मानी जाती थी, अपनी विचारधारा में उदारवादी दृष्टिकोण का समायोजन करते हुए, सोसालिस्ट, कांग्रेस (ओल्ड) व भारतीय लोकदल जैसी पार्टियों के साथ विलय करना स्वीकार कर जनता पार्टी का गठन किया।
1977 में जनता पार्टी ने आपातकाल के बाद चुनाव में हिस्सा लिया व भारी सफलता प्राप्त की। प्रधानमन्त्री के पद पर कांग्रेस (ओल्ड) के नेता श्री मुरारजी भाई देसाई, को नियुक्त किया गया। जनता पार्टी में सरकार बनने के बाद ही मतभेद व विवाद उत्पन्न होंगे। जनसंघ के आर. एस. एस. के साथ सम्बन्धों को लेकर विवाद उत्पन्न हो गए। उधर चौधरी चरण सिंह व बाबू जगजीवन राम को भी दबाव की राजनीति के चलते उप-प्रधानमंत्री के पद पर नियुक्त करना पड़ा।
इस प्रकार जनता पार्टी आए दिन नए-नए विवादों में घिरती रही व अन्त में 1979 में जनता पार्टी टूट गयी। जनवरी 1980 को जनसंघ को दोबारा जीवित ना करते हुए भारतीय जनता पार्टी का गठन किया गया। इस बार की भारतीय जनता पार्टी पुरानी जनसंघ से भिन्न थी। इस बार भारतीय जनता पार्टी का आधार व्यापक किया गया। यह जनसंघ की अपनी हिन्दुवादी, पूँजीपतियों की पार्टी व शहर से सम्बन्ध रखने वाली पार्टी की छवि को दूर कर सभी वर्गों के समर्थन को प्राप्त करना चाहती थी। भारतीय जनता पार्टी ने अपना ग्रामीण क्षेत्र में भी अपना जनाधार बनाया व किसानों के हितों को भी अपने कार्यक्रमों में शामिल किया भारतीय जनता पार्टी ने गाँधीवाद समाजवाद को अपना एजेन्डा बनाया। यहाँ तक कि अल्पसंख्यकों का भी भरोसा जीतने का निर्णय लिया गया। इस प्रकार आपातकाल के बाद भारतीय जनता पार्टी एक व्यापक विचारधारा वाली पार्टी बनी।
प्रश्न 6. कांग्रेस के प्रभुत्व का दौर समाप्त हो गया है। इसके बावजूद देश की राजनीति पर कांग्रेस का असर लगातार कायम है। क्या आप इस बात से सहमत हैं? अपने उत्तर के पक्ष में तर्क दीजिए।
उत्तर- 1952 के चुनाव से कांग्रेस का प्रभुत्व लगातार कायम रहा है। 1967 के चुनाव में पहली बार कांग्रेस को झटका लगा जब 1967 के चुनाव में कांग्रेस 9 राज्यों में सरकार नहीं बना सकी व केन्द्र में भी साधारण बहुमत से ही सरकार बना पायी राजनीतिक क्षेत्र में यह माना जाता है कि 1967 में कांग्रेस का प्रभुत्व समाप्त हो गया। यह सच है कि 1947 से लेकर 1967 तक कांग्रेस का प्रभुत्व कायम था क्योंकि कांग्रेस के पास राष्ट्रीय आन्दोलन के समय का पंडित जवाहर लाल नेहरू व सरदार पटेल जैसा करिश्माई नेतृत्व था व राष्ट्रीय आन्दोलन को लड़ने व स्वतन्त्रता प्राप्त करने की गौरवमई विरासत भी थी।
1967 के चुनाव से 1971 तक कांग्रेस बड़े संघर्ष से गुजरी क्योंकि इस बीच कांग्रेस आन्तरिक मन्थन से चल रही थी। 1969 में कांग्रेस का विभाजन हुआ। कांग्रेस ने श्रीमति इन्दिरा गाँधी के नेतृत्व में कई क्रान्तिकारी कार्यक्रम प्रारम्भ किए। 1971 में चुनाव हुए जिसमें कांग्रेस ने गरीबी हटाओ जैसे नारे लगाए। 1971 में संयुक्त विरोधी दलों के बावजूद कांग्रेस को भारी सफलता मिली। 1971 से लेकर 1975 तक विभिन्न राज्यों विशेषकर बिहार व गुजरात में कांग्रेस विरोधी आन्दोलन चले जो इतने अधिक हो गए कि 25 जून 1975 को आपातकाल स्थिति की घोषणा करनी पड़ी। 1975 से लेकर 1977 तक आपातकाल की स्थिति रही। 1977 के चुनाव में कांग्रेस को आपातकाल का गुस्सा झेलना पड़ा व कांग्रेस को फिर सफलता मिली। 1984 में श्रीमति इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद 1984 के चुनावों में कांग्रेस को फिर सफलता मिली 1989 के चुनाव में फिर कांग्रेस को हार का मुंह देखना पड़ा। 1989 से लेकर 1996 तक फिर कांग्रेस सबसे बड़ी विरोधी दल रही। परन्तु पुनः 2004 से यू.पी.ए. सरकार का नेतृत्व कांग्रेस ही कर रही है।
प्रश्न 7. अनेक लोग सोचते हैं कि सफल लोकतन्त्र के लिए दलीय व्यवस्था जरूरी है। पिछले बीस सालों के भारतीय अनुभवों को आधार बनाकर एक लेख लिखिए और इसमें बताइए कि भारत की मौजूदा बहुदलीय व्यवस्था के क्या फायदे हैं।
उत्तर- भारत एक संघीय समाज है जिसमें अनेक जाति, धर्म, भाषा, बोली, संस्कृति व भौगोलिकताओं के लोग रहते हैं अत: लोगों के विभिन्न प्रकार के सामाजिक, आर्थिक, व्यवसायिक व क्षेत्रीय हित हैं जिनको विकसित करने के लिए व इनकी रक्षा करने के लिए इनके अर्थात् नागरिकों के मौलिक अधिकार प्राप्त हैं। अपनी बात को कहने, विचारों को व्यक्त करने, संघ व समुदाय बनाने का भी अधिकार नागरिकों को प्राप्त हैं। इसी आधार पर भारत में बहुदलीय प्रणाली है।
बहुदलीय प्रणाली होते हुए भी भारत में कांग्रेस का प्रभुत्व एक लम्बे समय तक रहा है। एक लम्बे समय तक बहुत सारी विरोधी पार्टियाँ होते हुए भी भारत में मजबूत विरोधी दल का अभाव रहा है। भारत में बहुदलीय प्रणाली के कारण वैचारिक कम है बल्कि सामाजिक धार्मिक वे क्षेत्रीय अधिक है। 1984 के बाद भारत में भारतीय दलीय व्यवस्था एक नए दौर से गुजर रही है। क्षेत्रीय दलों की सरकारें सफलता पूर्वक कार्य कर रही है। 1984 से लेकर 2004 तक विभिन्न राजनीतक दल विरोधी दलों व शासक दलों के रूप में कार्य कर रहे हैं। यह बहुदलीय प्रणाली की सबसे बड़ी उपयोगिता है कि शासक दल पर कई और से दबाव बना रहता है व सरकार गिरने की स्थिति में विरोधी दल सरकार बनाने के लिए तैयार रहते हैं।
1989 के बाद भारत के गठबंधन सरकारों का दौर चल रहा है जिसमें बहुदलीय प्रणाली का अपना अलग प्रभाव है। क्षेत्रीय दल गठबन्धन सरकारों में प्रान्तीय स्तर व केन्द्रीय स्तर पर भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहे हैं। क्षेत्रीय दल ना केवल अपने राज्यों के हितों की रक्षा कर रहे हैं व अपने क्षेत्र के लोगों का विकास कर रहे हैं बल्कि राष्ट्रीय हितों व क्षेत्रीय हितों में एक सामंजस्य पैदा करने में सहायक होते हैं। बहुदलीय प्रणाली भारत की विभिन्नता में एकता की युक्ति को चरितार्थ करती है।
प्रश्न 8. निम्नलिखित अवतरण को पढ़ें और इसके आधार पर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दें।
“भारत की दलगत राजनीति ने कई चुनौतियों का सामना किया है। कांग्रेस प्रणाली ने अपना खात्मा ही नहीं किया बल्कि कांग्रेस के जमावड़े के बिखर जाने से आत्म-प्रतिनिधित्व की कई नई प्रवृत्ति का जोर बढ़ा। इससे दलगत व्यवस्था और विभिन्न हितों की कमाई करने की इसकी क्षमता पर भी सवाल उठे। राज व्यवस्था के सामने एक महत्वपूर्ण काम एक ऐसी दलगत व्यवस्था खड़ी करने अथवा राजनीतिक दलों को गढ़ने की है जो कारगर तरीके से विभिन्न हितों को मुखर और एकजुट करें।”
(क) इस तथ्य को पढ़ने के बाद क्या आप दलगत व्यवस्था की चुनौतियों की सुचि बना सकते हैं?
(ख) विभिन्न हितों का समाहार और उनमें एक जुटता का होना जरूरी है।
(ग) इस अध्याय में आपने अयोध्या विवाद के बारे में पढ़ा। इस विवाद ने भारत के राजनीतिक दलों की समाहार की क्षमता के आगे क्या चुनौती पेश की?
उत्तर- (क) भारतीय दलीय प्रणाली की निम्न चुनौतियाँ हैं–
- आन्तरिक प्रजातन्त्र का अभाव
- व्यक्ति पूजा
- अनुशासनहीनता
- अवसरवादिता
- गुटबाजी
- राष्ट्रीय दलों का घटता प्रभाव
- क्षेत्रीय दलों का बढ़ता प्रभाव
- जाति के आधार पर राजनीतिक दलों का गठन
- धर्म के आधार पर राजनीतिक दलों का गठन
- गठबन्धन की राजनीति
- सिद्धान्त हीन समझौते
- धन की बढ़ती भूमिका
- हिंसा की बढ़ती भूमिका
- संस्थाओं की गरिमा में गिरावट
- दल-बदल की प्रवृति
(ख) बहुल समाज में लोगों के विभिन्न आधारों पर भिन्न-भिन्न हित होते हैं, जिनका पूरा होना लोगों के विकास के लिए व प्रजातन्त्र की सफलता के लिए अति आवश्यक है। प्रजातन्त्रीय विकेन्द्रीकरण की आवश्यकता है कि शक्तियों का विकेन्द्रीकरण इस प्रकार से हो कि लोगों की क्षेत्रीय आवश्यकताएं पूरी हो उनकी सांस्कृतिक मान्यताएँ व आकांक्षाएँ विकसित हो। बहुल समाज में लोगों के दो प्रकार के हित होते हैं एक क्षेत्रीय हित दूसरे राष्ट्रीय हित अत: राष्ट्रीय एकता अखंडता के लिए यह आवश्यक है कि लोगों के क्षेत्रीय, निजी हितों व राष्ट्रीय हितों में सामंजस्य हो व समायोजन हो।
(ग) अयोध्या में बाबरी मस्जिद बनाम राम मन्दिर विवाद ने भारतीय राजनीति को अत्यधिक प्रभावित किया है व भारतीय दलीय प्रणाली के सामने अनेक प्रश्न खड़े कर उन्हें अग्नि परीक्षा देने के लिए मजबूर किया। बाबरी मस्जिद व राम मन्दिर निर्माण का विवाद एक ऐसा विवाद है जिसको ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर राष्ट्रीय भावना के आधार पर सुलझाना चाहिए परन्तु इस विषय का हमेशा रोजनीतिकरण व साम्प्रदायिकरण किया गया। इस विवाद पर कोई भी राजनीतिक दल ऐसा नहीं रहा जिसने इस विवाद पर व्यापक सोच के आधार पर अपनी प्रतिक्रिया दी हो। सभी राजनीतिक दलों ने इस विवाद से राजनीतिक लाभ ही निकालने का प्रयास किया है।
सर्वप्रथम श्री राजीव गाँधी ने 1986 में बाबरी मस्जिद के विवादित जगह के आहते का ताला खुलवा कर हिन्दुओं को पूजा पाठ करने की स्वीकृति दी जिसका उद्देश्य हिन्दुओं की वोटों को सुरक्षित करना था। मुस्लिम लीग व अन्य मुस्लिम संगठनों ने भी इस विषय को केवल धार्मिक/साम्प्रदायिक सोच के आधार पर ही देखा। भारतीय जनता पार्टी जो पहले हिन्दुवादी जनसंघ थी, ने इस विवाद का सबसे अधिक राजनीतिक लाभ उठाया व साम्प्रदायिकरण किया। 1992 में विवादित ढाँचा ध्वंस करने के बाद भारतीय जनता पार्टी ने अपने राजनीतिक आधार पर इस प्रकार से बढ़ाया है कि लोकसभा ने इसके सदस्यों की संख्या में वृद्धि हुई है। 1999 से 2004 में एन.डी.ए. सरकार भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में ही चली।
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