8. क्षेत्रीय आकांक्षाएँ


प्रश्न 1. निम्नलिखित में मेल करें भाग–

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उत्तर-

(1) – (स)
(2) – (
द)
(3) – (
ब)
(4) – (
अ)


प्रश्न 2. पूर्वोत्तर के लोगों की क्षेत्रीय आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति कई रूपों में होती है। बाहरी लोगों के खिलाफ आन्दोलन ज्यादा स्वतन्त्रता की माँग के आन्दोलन और अलग देश की माँग करना ऐसी ही कुछ अभिव्यक्तियाँ है। पूर्वोत्तर के मानचित्र पर इन तीनों के लिए अलग-अलग रंग भरिए व दिखाईए कि राज्य में कौन-सी प्रवृत्ति ज्यादा प्रबल हैं।
उत्तर- छात्र स्वयं करें।


प्रश्न 3. आनंदपुर साहिब प्रस्ताव के विवादास्पद होने के क्या कारण थे?
उत्तर- 1970 के दशक में पंजाब में अकालियों का आन्दोलन और अधिक तेज हो गया व इसके एक समूह ने पंजाब के लिए अधिक स्वायत्तता की मांग उठाई। 1973 में आनंदपुर साहिब में हुए एक सम्मेलन में इस आशय का प्रस्ताव पारित किया जिसे आनंदपुर साहिब प्रस्ताव के नाम से जाना जाता है। इस प्रस्ताव में केन्द्र व प्रांतों के सम्बन्धों को पुनः पारिभाषित करने की माँग की जिसमें राज्यों के सभी क्षेत्राधिकार देकर केन्द्र को कुछ सीमित विषयों (विदेशसम्बन्धरक्षा व बजट) पर क्षेत्राधिकार सीमित किया।

विभिन्न स्तर पर इस प्रस्ताव को अलग राज्य की माँग के रूप में देखा गया। आनन्दपुर साहिब प्रस्ताव को प्रारम्भ में पंजाब में ऐसी भावना का विकास किया कि पहले सीमा क्षेत्र व पानी के बँटवारे के मद्दे की राजनीति प्रारम्भ हुई व बाद में पंजाब को सिख राज्य के रूप (खालिस्तान) में माँग का आन्दोलन प्रारम्भ किया जिससे पूरा राज्य उग्रवाद की चपेट में आ गया।


प्रश्न 4. जम्मू-कश्मीर की अंदरुनी विभिन्नताओं की व्याख्या कीजिए व बताइए कि इस राज्य में किस तरह अनेक क्षेत्रीय आकांक्षाओं में इन विभिन्नताओं के कारण सर उठाया।
उत्तर- जम्मू-कश्मीर में तीन राजनीतिक एवं सामाजिक क्षेत्र शामिल हैं-जम्मूकश्मीर व लद्दाख। कश्मीर को इस राज्य का सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण क्षेत्र माना जाता है। कश्मीरी बोलने वाले ज्यादातर लोग मुस्लिम हैं। बहरहालकश्मीरी भाषा लोगों में अल्पसंख्यक हिन्दु भी शामिल हैं। जम्मू क्षेत्र पहाड़ी तलहटी एवं मैदानी इलाके का मिश्रण है जहाँ हिन्दूमुस्लिम और सिख यानी कई धर्म व भाषाओं के लोग रहते हैं। लद्दाख पर्वतीय इलाका है जहाँ बौद्ध व मुस्लिमों की आबादी है। इस क्षेत्र में बहुत कम आबादी है। जम्मू-कश्मीर की समस्या के दोनों पहलू हैबाहरी भी व आन्तरिक भी।

जम्मू-कश्मीर अपनी अलग पहचान के संघर्ष में लगा है जहाँ भारत व पाकिस्तान भी इस समस्या से जुड़े हैं । जम्मू कश्मीर को भारत अपना अभिन्न अंग मानता है जबकि पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय को विवादित मानता है। वहीं जम्मू कश्मीर का एक वर्ग जम्मू-कश्मीर को अलग स्वतंत्र प्रभुसत्ता सम्पन्न राज्य के रूप में देखना चाहते हैं।

1948 के बाद से ही यह विवाद जारी है। दूसरी ओर जम्मू-कश्मीर की अपनी आन्तरिक समस्या भी है जम्मू क्षेत्र पहाड़ी व मैदानी इलाके का मिश्रण है व अपनी अधिक राजनीतिक स्वायत्तता की माँग करता रहा है। कश्मीर राज्य का दिल है व इसकी पहचान को कश्मीरियत के रूप में जाना जाता है। समय-समय पर लद्दाख के लोगों की ओर से भी मांग उठती रहती है कि इस क्षेत्र को सांस्कृतिक व आर्थिक विकास के लिए पर्याप्त स्वायत्तता मिलनी चाहिए।


प्रश्न 5. कश्मीर की क्षेत्रीय स्वायत्तता के मसले पर विभिन्न पक्ष क्या हैंइनमें कौन-सा पक्ष आपको समुचित जान पड़ता हैअपने उत्तर के पक्ष में तर्क दीजिए।
उत्तर- जम्मू-कश्मीर भारत का वह राज्य है जिसने भारत सरकार अधिनियम 1947 के कानून के आधार पर प्रारम्भ में तो स्वतन्त्र राज्य के रूप में रहने की इच्छा व्यक्त की थी परन्तु 1948 में जब कबालियों ने इस पर आक्रमण कर इसके एक भाग को अपने कब्जे में कर लिया तो उस समय के राजा हरि सिंह ने भारत के साथ जम्मू-कश्मीर को विलय कर दिया परन्तु कुछ विशेष स्थिति को ध्यान में रखते हैं इसे विशेष दर्जा दिया जाए अत: भारत के संविधान के अनुच्छेद 370 व 371 के तहत इसे विशेष दर्जा दिया गया। विशेष दर्जे से यह व्यवस्था है कि जम्मू-कश्मीर का अपना संविधान होगा व भारत की संसद का कानून जम्मू-कश्मीर में तभी लागू होगा जब जम्मू-कश्मीर की विधान सभा उस बिल को पास कर दे।

जम्मू-कश्मीर को अधिक स्वायत्तता देने के लिए दिए गए अनुच्छेद 370 के सम्बन्ध में अलग-अलग विचार है। कुछ लोगों का यह कहना है कि इसके दिए गए प्रावधान जम्मू-कश्मीर की क्षेत्रीय स्वायत्तता के लिए अपर्याप्त है व इनको पूर्ण रूप से लागू नहीं किया जाता। जबकि अन्य वर्ग का यह मानना है कि 370 को समाप्त कर देना चाहिए व जम्मू-कश्मीर को भी अन्य राज्यों की तरह ही बराबर का दर्जा मिलना चाहिए।

दोनों पक्षों के निष्पक्ष अध्ययन से यह बात कही जा सकती है कि जम्मू-कश्मीर का विषय निश्चित रूप से अलग है व जरूरत है एक ऐसा वातावरण बनाने की कि जम्मू-कश्मीर के लागे कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग मानने लगे इसके लिए जम्मू-कश्मीर के पूर्ण सांस्कृतिक व आर्थिक विकास की आवश्यकता है। जम्मू कश्मीर के नौजवानों को अधिक से अधिक रोजगारों व स्वयं रोजगारों में लगाकर उन्हें राष्ट्र की मुख्यधारा में लाने की आवश्यकता है। जम्मू-कश्मीर के विकास को इस प्रकार से नियोजित करने की आवश्यकता है कि अन्य राज्यों पर इसका प्रतिकूल प्रभाव ना पड़े। आज की सच्चाई यह है कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है जिसके पूर्ण विकास की जिम्मेवारी सभी पर है।


प्रश्न 6. असम आन्दोलन सांस्कृतिक अभियान और आर्थिक पिछड़ेपन की मिली-जुली अभिव्यक्ति था। व्याख्या करें।
उत्तर- असम भारत का एक प्रमुख राज्य है जिसके साथ भारत की महत्वपूर्ण अन्तर्राष्ट्रीय सीमा लगती है। असम पूर्वोत्तर के सात राज्यों (जिन्हें सात बहनें भी कहा जाता है) में सबसे बड़ा व सबसे प्रमुख राज्य है। असम की अपनी अलग सांस्कृतिक पहचान है। असमी भाषा बोलने वालों का इन राज्यों में पहलवाद है जिसके प्रभुत्व का अन्य राज्यों में बोली जाने वाली भाषा के लोगों ने इसका विरोध किया है।

यह सच है कि असम के लोगों को अपनी विशिष्ट भौगोलिकता व सांस्कृतिक धरोहर व पहचान पर अभिमान रहा है यही कारण है कि जब भी इनके इस अभिमान को किसी भी क्षेत्र से ठेस लगती है तो इनका विरोध अत्यधिक तीव्र होता है। इनके द्वारा चलाए गए विभिन्न आन्दोलन इस सच्चाई का परिणाम है।असम आन्दोलन का एक और कारण है असम का आर्थिक पिछड़ापनजिसका सबसे ज्यादा प्रभाव वहाँ के युवाओं पर पड़ा जिन्होंने विभिन्न हिंसात्मक आन्दोलनों में भाग लेना प्रारम्भ कर दिया।

केन्द्र सरकार भी विभिन्न राजनीतिक व आर्थिक कारणों से असम के विकास की ओर ध्यान नहीं दे पायी जिससे असम के लोगों का असन्तोष लगातार बढ़ता रहा जिसमें हिंसात्मक आन्दोलन का जन्म हुआ। अब असम के लोग किसी भी बाहरी लोगों को बर्दास्त नहीं करते। यही कारण है कि बंगला देशबिहार व पश्चिम बंगाल से आए व बसे लोगों को वे इसलिए सहन नहीं कर पाते क्योंकि उनका यह मानना है कि उनके श्रोतों पर ये बाहर के लोग कब्जा कर रहे हैं। अत: यह सत्य है कि असम आन्दोलन सांस्कृतिक अभियान व आर्थिक पिछड़ेपन की मिली-जुली अभिव्यक्ति है।


प्रश्न 7. हर क्षेत्री आन्दोलन अलगाववादी माँग की तरफ अग्रसर नहीं होता। इस अध्याय से उदाहरण देकर इस तथ्य की व्याख्या कीजिए।
उत्तर- भारत में विभिन्नता में एकता है। भारत एक बहुल समाज है जिसमें विभिन्न जातिधर्मभाषा व सांस्कृतिक पहचान के लोग रहते हैं। सभी लोग अपने व्यवसायिक व आर्थिक हितों के प्रति सजग हैं। भारत एक प्रजातन्त्रीय देश है जिसमें सभी को अपनी बात कहने व संघ बनाने व विरोध जताने का अधिकार है। इसी सन्दर्भ में भारत में लोगों के द्वारा अपने हितों की रक्षा करने व विकसित करने का अधिकार है। अपने हितों को प्राप्त करने के लिए लोग एकत्रित होते हैंसंघ बनाते हैं व आन्दोलन भी चलाते हैं।

भारत के कई क्षेत्रों में इस प्रकार के आन्दोलन जारी रहते हैं जो भारतीय राजनीति को गहराई से प्रभावित करते हैं। आन्दोलन को प्रजातन्त्रीय प्रणालियों में स्वीकार किया जाता है परन्तु जब ये आन्दोलन उग्रवादियों व असामाजिक तत्वों के हाथों में चले जाएँ अथवा कट्टरवादियों का नियन्त्रण इन आन्दोलनों पर हो जाए तब सीमा समाप्त हो जाती है व प्रजातन्त्र के लिए खतरा भी पैदा हो जाता है।

भारत के कई राज्यों जैसे पंजाबजम्मू-कश्मीर व कई उत्तर पूर्वी राज्यों जैसे नागालैंड व मिजोरम में उग्रवादी आन्दोलन चले हैं जो भारत की एकता अखंडता के लिए खतरा बन गए थे क्योंकि वे भारत से अलग होने की माँग कर रहे थे। पंजाब के आन्दोलनकारी भी हिंसात्मक हो गए थे व खालिस्तान (सिख राज्य’ की माँग कर रहे थे।

लेकिन कई राज्यों में विभिन्न क्षेत्रीय व्यवसायिक व आर्थिक हितों के लिए आन्दोलन चलाए गए हैं जैसे उत्तर प्रदेश में किसान आन्दोलनअसम में बोडो आन्दोलन भी अलगाववाद जैसे कोई माँग नहीं कर रहा था। असमी लोगों का विरोध बाहरी राज्यों से आए विस्थापित लोगों के खिलाफ है। झारखंड व छत्तीसगढ़ व उत्तराखंड भी ऐसे ही आन्दोलनों का परिणाम है जिसमें वे एक निश्चित क्षेत्र के विकास का मुद्दा उठा रहे थे।


प्रश्न 8. भारत के विभिन्न भागों से उठने वाली क्षेत्रीय मांगों से विविधता में एकता के सिद्धान्त की अभिव्यक्ति होती है। क्या आप इस कथन से सहमत हैं?
उत्तर- यह कथन सही है कि विभिन्न राज्यों व क्षेत्रों से उठने वाली माँगों व उन मांगों के सम्बन्ध में चल रहे आन्दोलनों को हम भारत की विविधताओं की अभिव्यक्ति के रूप में समझ सकते हैं क्योंकि भारत एक बहुल समाज है जिसमें विभिन्न जातिधर्मभाषा व संस्कृति व भौगोलिकताओं के लोग रहते हैं जिनके प्रति लोगों में प्रजातन्त्र की प्रक्रिया के साथ-साथ लगाव व जागरूकता बढ़ी है। अत: वे अपने क्षेत्रीय भाषीय व भौगोलिक तथा सांस्कृतिक हितों की सुरक्षा के लिए विभिन्न रूपों में अपनी आवाज उठाते रहते हैं।

ये सब कुछ भारतीय संविधान द्वारा तय की गई सीमाओं में ही करते हैं क्योंकि प्रत्येक भारतीय में क्षेत्रीय व राष्ट्रीय भावनाएँ हैं जिसके आधार पर भारत में विभिन्नता में एकता है। यद्यपि कुछ क्षेत्रों से इस प्रकार की माँगें उठती रही है जिससे एकता व अखंडता को आघात लगा है। पंजाबनागालैंड व मीजोरम व जम्मू व कश्मीर से भी ऐसी माँगें अर्थात् अलग राज्यों की मांग अर्थात् भारत से अलग होने की माँग उठती रही है जिससे भारत की विभिन्नता में एकता की भावना को चोट लगी है। धीरे-धीरे सभी अलगाववादी तत्व भारत की राष्ट्रीय मुख्यधारा में शामिल हो गए हैं। भारत में बहुल समाज होने के बावजूद एकता की भावना छिपी हुई है।


प्रश्न 9. नीचे लिखे अवतरण को पढ़े व इसके आधार पर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दें–
हजारिका का गीत एकता की विजय पर है …… पूर्वोत्तर के सात राज्यों को इस गीत में एक ही माँ की सात बेटियाँ कहा गया है …….. मेघालय अपने रास्ते गई …… अरुणाचल भी अलग हुई व मिजोरम असम के द्वार पर दूल्हे की तरह दूसरी बेटी से ब्याह रचाने को खड़ा है ……. इस गीत का अन्त असमी लोगों की एकता को बनाए रखने के संकल्प के साथ होता है और इसमें समकालीन असम में मौजूद छोटी-छोटी कौमो को भी अपने साथ एक जुट रखने की बात कही गई है …….. कबरी और मिसिंग भाई बहन हमारे ही प्रियजन हैं। संजीव व वरुथा।

(क) लेखक यहाँ किस एकता की बात कर रहा है?
(
ख) पुराने राज्य असम से अलग करके पूर्वोत्तर के अन्य राज्य क्यों बनाए गए?
(
ग) क्या आपको लगता है कि भारत के सभी क्षेत्रों के ऊपर की यही बात लागू हो सकती हैक्यों?

उत्तर- (क) इस लेख में लेखक ने असम के उन सब लोगों व क्षेत्रों की बात कर रहा है जो बाद में सात राज्यों में विभाजित हो गए। लेखक ने इन सात राज्यों को एक ही माँ अर्थात् (असम) की सात बेटियाँ कहा है जो भले ही असम से अलग हो गए हों पर उन सबका सामाजिकसांस्कृतिक व भौगोलिक साथ है व एकता है।

() आजादी के समय मणिपुर और त्रिपुरा रियासतें थी शेष पूर्वोत्तर इलाका असम कहलाता था। गैर असमी लोगों को लगा कि असम की सरकार उन पर असमी भाषा थौंप रही है। अत: गैर असमी लोगों ने अपनी भाषीय पहचान को सुरक्षित करने के लिए अपने निश्चित क्षेत्र के लिए राजनीतिक स्वायत्तता की माँग उठा ली। पूरे राज्य में असमी भाषा को लादने के खिलाफ विरोध प्रदर्शन और दंगे हुए व असम से अलग होकर अपनी भाषीय पहचान के आधार पर अलग राज्य की माँग करने लगे।

पूर्वोत्तर के पूरे इलाके का बड़े व्यापक स्तर पर राजनीतिक पुनर्गठन हुआ। नागालैंड को 1960 में राज्य बनाया गया। 1972 में मेघालयमणिपुर व त्रिपुरा राज्य बने। असम से अन्य राज्यों के अलग होने का कारण आर्थिक विसमताएँ भी थी। 1959 में मिजो पर्वतीय इलाके में भारी अकाल पड़ा। असम की सरकार इस अकाल में समुचित प्रबन्ध ना कर सकी जिससे मिजोरम के लोगों में असंतोष बढ़ गया जो धीरे-धीरे हिंसात्मक अलगाववादी आन्दोलन का रूप लेने लगा।

1986 में राजीव गाँधी व लाल डेगा के बीच समझौते के आधार पर मिजोरम राज्य का गठन हुआ। इसी प्रकार से राजीव गाँधी व फिजो के समझौते के आधार पर नागालैंड भी एक राज्य के रूप में गठित किया गया। इस प्रकार से हम कह सकते हैं कि असम से अन्य राज्यों के अलग होने के दो प्रमुख कारण रहे –

  1. भाषीय पहचान के खोने का डर
  2. आर्थिक पिछड़ापन

(ग) भारत जब 1947 में आजाद हुआ था उस समय लगभग 13 राज्य व केन्द्र शासित प्रदेश थे। आज भारत 29 राज्यों का संघ है। नए राज्यों का निर्माण विभिन्न राज्यों में विभिन्न आधारों पर विभिन्न क्षेत्रों से उठी मांगों के आधार पर किया गया। भारत एक बहुल समाज है जिसमें विभिन्न संस्कृतियोंबोलियोंभाषाओं व भौगोलिकताओं के लोग रहते हैं जिनकी अपनी एक विशिष्ट पहचान है। बड़े-बड़े राज्यों में आर्थिक स्तर पर भी क्षेत्रीय असन्तुलन हो जाना भी स्वाभाविक है जिससे एक क्षेत्र में दूसरे क्षेत्र के साथ प्रतियोगिता प्रारम्भ हो जाता है जिससे अलगाववाद की भावना उत्पन हो जाती है।

1955 तक कई राज्यों में भाषा के आधार पर क्षेत्रीय विकास में आर्थिक असन्तुलन को लेकर अलग राज्यों के गठन की मांग बड़ी तेजी से उभरी जिसके परिणाम स्वरूप कई बड़े राज्यों जैसे महाराष्ट्रबिहारउत्तर प्रदेश व मध्य प्रदेश जैसे राज्यों से अलग राज्य बनाने की मांग उठी। 1956 भाषा के आधार पर राज्य पुनर्गठन कानून पास किया गया जिसके आधार पर भाषा के आधार पर अनेक राज्यों का गठन किया गया। 1966 में हरियाणा का पंजाव से विभाजन हुआ। क्षेत्रीय आर्थिक व प्रशासनिक विकास के मुद्दों के आधार पर झारखंडछत्तीसगढ़ व उत्तराखंड राज्य अस्तित्व में आए।