1. शीत युद्ध का दौर


प्रश्न 1. शीतयुद्ध से हथियारों की होड़ और हथियारों पर नियंत्रण-ये दोनों ही प्रक्रियाएँ पैदा हुईं। इन दोनों प्रक्रियाओं के कारण थे?
उत्तर- यही सही है कि शीतयुद्ध से हथियारों की होड़ और हथियारों पर नियंत्रण दोनों ही प्रक्रियाएँ हुई। जहाँ तक हथियारों की होड़ के कारणों का सवाल है –

संदेह और प्रतिद्वन्द्विता के कारण हुआ। 1945 में अमेरिका द्वारा जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर बम गिराए जाने के बाद जापान के आत्म-समर्पण के पश्चात् द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त हो गया। परंतु विभिन्न राष्ट्रों में एक-दूसरे के प्रति शंका और भय बना रहा। उन्हें अपने ऊपर आक्रमण की आशंका बनी रही। इससे अपने को सुरक्षित रखने के लिए विभिन्न राष्ट्रों ने हथियार बनाना शुरू कर दिया। हथियार बनाने की उसकी महत्वाकांक्षाएँ बढ़ती गई और वे हथियारों का जखीरा तैयार करने लगे। सभी राष्ट्र एक-दूसरे से अधिक हथियार बनाने लगे। अब हथियारों की होड़ शुरू हो गई जर्मनी पनडुब्बी बनाता तो इंग्लैंड पनडुब्बी बनाता। इस प्रकार विभिन्न देशों में हथियारों की होड़ की प्रक्रिया शुरू हो गई। परमाणु हथियार भी बड़े पैमाने पर बनने लगे। दोनों महाशक्तियाँ परमाणु हथियारों की दृष्टि से प्रतिद्वन्द्विता करने लगीं।

परमाणु हथियारों की होड़ से खतरा बढ़ गया। अतः हथियारों पर नियंत्रण आवश्यक हो गया। शीतयुद्ध शुरू होने के पीछे यह समझ भी काम कर रही थी कि परमाणु बम से होने वाले विध्वंस की मार झेलना किसी भी राष्ट्र के बूते की बात नहीं थी। यह एक सीधा-सादा लेकिन असरदार कारण था। परमाणु युद्ध की सूरत में दोनों गुटों को इतना नुकसान उठाना पड़ता कि उनमें से विजेता कौन है-निश्चित करना मुश्किल हो जाता। इसी कारण समय रहते अमेरिका और सोवियत संघ ने कुछ परमाण्विक और अन्य हथियारों को सीमित या समाप्त करने के लिए आपस में सहयोग करने का निर्णय किया।


प्रश्न 2. महाशक्तियाँ छोटे देशों के साथ सैन्य गठबंधन क्यों रखती थीतीन कारण बताइए?
उत्तर- महाशक्तियों द्वारा छोटे देशों के साथ सैन्य गठबंधन रखने के निम्नलिखित तीन कारण थे –

  1. छोटे देश से महाशक्तियाँ अपने हथियार और सेना का संचालन करना चाहती थी।
  2. महाशक्तियाँ छोटे देशों में सैनिक ठिकाने स्थापित करना चाहती थीं जिसमें वे एक-दूसरे की जासूसी कर सके।
  3. छोटे-छोटे देश सैन्य खर्च वहन करने में मददगार हो सकते थे।

प्रश्न 3. कभी-कभी कहा जाता है कि शीतयुद्ध सीधे तौर पर शक्ति के लिए संघर्ष था और इसका विचारधारा से कोई संबंध नहीं था। क्या आप इस कथन से सहमत हैंअपने उत्तर के समर्थन में एक उदाहरण दें।
उत्तर- कभी-कभी हम सहमत हो सकते हैं कि शीतयुद्ध सीधे तौर पर शक्ति के लिए संघर्ष था और इसका विचारधारा से कोई संबंध नहीं था। दोनों गुट एक-दूसरे के प्रति अपने को अधिक शक्तिशाली दिखाना चाहते थे। इसलिए हथियारों की होड़ शुरू हो गई थी। एक गुट या एक देश दो मिसाइलें बनाता तो उसका विरोधी गुट चार मिसाइलें बना देता। फिर पहला गुट चार से अधिक बना लेता तो दूसरा गुट फिर उससे अधिक बनाता। दोनों गुट अपनी शक्ति बढ़ाने के लिए अधिक से अधिक देशों को अपने गुट में शामिल करने का प्रयास करते थे।

ऐसा करने के लिए वे बल का भी प्रयोग करते थे। 1962 ई. में खुश्चेव (सोवियत संघ का नेता) ने अपनी शक्ति बढ़ाने के लिए क्यूबा में परमाणु मिसाइलें तैनात की। इन हथियारों की तैनाती से पहली बार अमेरिका निकट निशाने की सीमा में आ गया। अमेरिका ने इसको रोकने का प्रयास किया। क्यूबा भी साम्यवादी देश था। साम्यवादी सोवियत संघ ने विचार-धारा पर ध्यान न देकर क्यूबा के लिए संकट उत्पन्न कर दिया।

शीतयुद्ध का विचारधारा से संबंध न होने का उदाहरण जापान भी है। जापान एक पूँजीवादी देश थापरंतु पूँजीवादी अमरीका ने अपनी शक्ति बढ़ाने और प्रभुत्व जमाने के लिए उसके दो शहरों-हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराए। फलस्वरूप जापान को घुटने टेकने पड़े और उसका भारी नुकसान हुआ। इसलिए कहा जा सकता है कि शीतयुद्ध सीधे तौर पर शक्ति के लिए संघर्ष था और इसका विचारधारा से कोई संबंध नहीं था।


प्रश्न 4. शीतयुद्ध के दौरान भारत की अमेरिका और सोवियत संघ के प्रति विदेश नीति क्या थीक्या आप मानते हैं कि इन नीति ने भारत के हितों को आगे बढ़ाया?
उत्तर- शीतयुद्ध के दौरान की विदेशी नीति गुट-निरपेक्षता की नीति नहीं है। वह गुट-निरपेक्ष आंदोलन का नेतृत्व कर रहा था उसने दोनों महाशक्तियों-अमरिका और सोवियत संघ की खेमेबंदी से अपने को अलग रखा। उसने नव स्वतंत्र देशों को इन दोनों के गुटों में जाने का जोरदार विरोध किया। परंतु भारत ने विश्व राजनीति में अपने-आप को सक्रिय बनाए रखा।

उसने शीतकालीन प्रतिद्वन्द्विता की जकड़ कमजोर करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय मामलों में सक्रिय रूप से हस्तक्षेप करने के पक्ष में था भारत ने दोनों गुटों के बीच विद्यमान मतभेदों को दूर करने का प्रयास किया और इस प्रकार उसने इन मतभेदों को पूर्णव्यापी युद्ध का रूप लेने से रोका। भारत ने उन क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों को सक्रिय बनाए रखने की कोशिश की और अमेरिका अथवा सोवियत संघ के खेमे से नहीं जुड़े थे। कुछ विद्वानों का मानना है कि गुट-निरपेक्षता अंतर्राष्ट्रीयता का एक उदार आदर्श है। लेकिन यह आदर्श भारत के वास्तविक हितों से मेल नहीं खाता। गुट-रिपेक्षता की नीति से प्रत्यक्ष रूप से निम्नलिखित लाभ हुए–

  1. गुट-निरेक्षता के कारण भारत ऐसे अंतर्राष्ट्रीय निर्णय और पक्ष ले सका जिससे उसका हित होता हो। वह महाशक्तियों और खेमे के देशों के हितों के लिए अपने को बलि का बकरा नहीं बनाया।
  2. भारत ने सदैव अपने को ऐसी स्थिति में बनाए रखा कि यदि एक महाशक्ति उसके विरुद्ध हो जाए तो दूसरी महाशक्ति के निकट आने का प्रयास करे।
  3. यदि भारत को कभी यह महसूस हुआ कि महाशक्तियों में से कोई उसकी उपेक्षा कर रहा है या अनुचित दबाव डाल रहा है तो दूसरी महाशक्ति की तरफ मुड़ जाता था।
  4. भारत ने अपनी ओर से किसी भी महाशक्ति को निश्चित नहीं होने दिया और न ऐसी स्थिति आने दी कि वह उस पर धौंस जमा सके। इस प्रकार भारत सदैव सुरक्षित रहा।

प्रश्न 5. गुट-निरपेक्ष आंदोलन को तीसरी दुनिया के देशों ने तीसरे विकल्प के रूप में समझा। जब शीतयुद्ध अपने शिखर पर था तब इस विकल्प ने तीसरी दुनिया के देशों के विकास में कैसे मदद पहुँचाई?
उत्तर- तीसरी दुनिया के देशों में वे देश शामिल थे जो हाल में ही विदेशी शिकंजों से मुक्त हुए हैं और वे गुट-निरपेक्ष आंदोलन के सदस्य हैं। वे अल्प-विकसित राष्ट्र हैं। गुट-निरपेक्ष आंदोलन ने तीसरे विकल्प के रूप में तीसरी दुनिया के देशों के सामने मुख्य चुनौती आर्थिक रूप से अधिक विकास करने तथा अपनी जनता को गरीबी से उबारने की थी।

इसी विचार से नव अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था की धारणा का जन्म हुआ। 1972 में संयुक्त राष्ट्रसंघ के व्यापार और विकास से संबंधित सम्मेलन में अल्प-विकसित देशों के आर्थिक सुधार की एक रिपोर्ट प्रस्तुत की। गुट-निरपेक्ष आंदोलन में धीरे-धीरे परिवर्तन हुआ और इसमें आर्थिक मुद्दों को अधिक महत्व दिया जाने लगा बेलग्रेड सम्मेलन (1961) के बाद से आर्थिक मुद्दों को प्रमुखता दी जाने लगी और गुट-निरपेक्ष आंदोलन आर्थिक दबाव समूह बन गया।


प्रश्न 6. ‘गुट-निरपेक्ष आंदोलन अब प्रासंगिक हो गया है। आप इस कथन के बारे में क्या सोचते हैं। अपने उत्तर के समर्थन में तर्क प्रस्तुत करें।
उत्तर- दिसम्बर 1991 में सोवियत संघ का विघटन हो गया और इसके सभी स्वायत्त गणराज्यों ने अपने को संपूर्ण प्रभुसत्तापूर्ण स्वतंत्र राज्य घोषित कर लिया तथा सुरक्षा परिषद् में सोवियत संघ का स्थान रूसी गणराज्यों के रूप में प्राप्त हुआ। इसके साथ रूसी राज्यों ने अमेरिका के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित कर लिए हैं और ऐसा लगता है कि अब विश्व में गुटबंदी समाप्त हो गई है। इस संदर्भ में मित्र ने सुझाव दिया है कि गुटबंदी समाप्त होने के कारण गुट-निरपेक्ष आंदोलन का प्रमुख उद्देश्य पूरा हो गया है और अब केवल प्रगतिविकास और देशों में आर्थिक समता स्थापित करने का काम शेष रह गया है। इसलिए अब मिस्र कहता है कि अब गुट-निरपेक्ष आंदोलन को 77 के समूह (Group of 77) में शामिल हो जाना चाहिएक्योंकि इसका भी यही उद्देश्य है। फिर भी इस आंदोलन की प्रासंगिकता निम्नलिखित कारणों से है–

  1. यह आंदोलन मौजूदा असामानताओं से निपटने के लिए एक वैकल्पिक विश्व व्यवस्था बनाने और अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था को लोकतंत्रधर्मी बनाने में सहायक हो सकता है।
  2. गुट-निरपेक्ष आंदोलन विश्व में अमेरिका के अलावा दूसरे शक्ति केन्द्र के निर्माण का मार्ग अवरुद्ध कर सकता है।
  3. गुट-निरपेक्ष आंदोलन के साथ होकर सशक्त ताकत बन सकते हैं और विकसित देशों की उन नीतियों का विरोध कर सकते हैं।
  4. अमेरिका सर्वाधिक शक्तिशाली पूँजीवादी देश है। सभी गुट-निरपेक्ष देश मिलकर उसके शोषण का विरोध कर सकते हैं।