| 4. विचारक, विश्वास और ईमारतें : सांस्कृतिक विकास |
प्रश्न 1. क्या उपनिषदों में दार्शनिकों के विचार नियतिवादियों और भौतिकवादियों से भिन्न थे? अपने जवाब के पक्ष में तर्क दीजिए।
उत्तर- उपनिषदों में दार्शनिकों के विचार नियतिवादियों और भौतिकवादियों से भिन्न थे। उपनिषदों में दार्शनिकों के विचार हैं कि लोग जीवन का अर्थ, मृत्यु के बाद जीवन की सम्भावना और पुनर्जन्म के बारे में जानने के लिए हमेशा उत्सुक रहते हैं।
ऐसा विचार व्यक्त किया जाता है कि पूर्व जन्म के कर्मों से पुनर्जन्म निर्धारित होता है। नियतिवादी या भौतिकवादी लोग विश्वास करते थे कि सब कुछ पूर्व निर्धारित है। तात्पर्य यह है कि व्यक्ति के कर्मों का निर्धारण उसके जन्म से पहले हो जाता है।
प्रश्न 2. जैन धर्म की महत्त्वपूर्ण शिक्षाओं का संक्षेप में लिखिए।
उत्तर- जैन धर्म की महत्त्वपूर्ण शिक्षायें:
1. मोक्ष प्राप्ति:
आत्मा को कर्म बंधन से मुक्त करने को मुक्ति या निर्वाण कहा जाता है। जैन धर्म के अनुसार मोक्ष अर्थात् निर्वाण पाना प्रत्येक मनुष्य के जीवन का लक्ष्य है। निर्वाण पाने के तीन साधन-सम्यक् विश्वास, सम्यक ज्ञान और सम्यक् चरित्र हैं। जैनी इन्हें त्रिरत्न कहते हैं।
2. अहिंसा:
जैन धर्म में अहिंसा पर सबसे अधिक बल दिया गया है। अहिंसा का अभिप्राय है-किसी जीवधारी को कष्ट न देना। जैनी पशु-पक्षी तथा पेड़-पौधों को भी जीव मानते हैं। उनके अनुसार व्यक्ति को किसी भी जीव (मानव, पशु-पक्षी और पेड़-पौधे आदि) को मन, वाणी या कर्म से दुःख नहीं देना चाहिए। यही कारण है कि जैनी नंगे पाँव चलते हैं, पानी छानकर पीते हैं तथा मुँह पर पट्टी बाँधते हैं ताकि कोई जीव-हत्या न हो जाए।
3. घोर तपस्या और आत्म-त्याग:
जैनी घोर तपस्या तथा शरीर को अधिक कष्ट देने में विश्वास रखते हैं। उनका विश्वास है कि भूखे रहकर प्राण त्यागने से मनुष्य को मोक्ष प्राप्त होता है।
4. ईश्वर में अविश्वास:
जैनी ईश्वर के अस्तित्त्व को नहीं मानते हैं और ईश्वर की अपेक्षा तीर्थंकरों की पूजा करते हैं।
5. जाति-प्रथा में अविश्वास:
जैन धर्मावलंबियों के अनुसार इस धर्म में विश्वास रखने वाले समान हैं।
6. वेदों और संस्कृत भाषा की पवित्रता में अविश्वास:
जैन धर्म के अनुसार वेद ईश्वरीय ज्ञान नहीं और संस्कृत पवित्र भाषा नहीं है।
7. यज्ञ और बलि आदि में अविश्वास:
जैनी यज्ञ-हवन को मोक्ष पाने के लिए आवश्यक नहीं समझते। वे पशु-बलि का भी विरोध करते हैं।
8. पुनर्जन्म और कर्म सिद्धांत में विश्वास:
जैनी इस बात में विश्वास रखते हैं कि अच्छे जन्म का कारण बनते हैं और बुरे कर्म बुरे जन्म का। इसलिए व्यक्ति को अच्छा जन्म पाने के लिए अच्छे कर्म करने चाहिए।
9. उच्च नैतिक जीवन:
महावीर स्वामी ने अपने अनुयायियों को चोरी-चुगली, लोभ, क्रोध आदि से दूर रहकर सदाचारी बनने का उपदेश दिया। महावीर स्वामी की मृत्यु के बाद जैन धर्म श्वेताम्बर और दिगम्बर नाम के दो सम्प्रदायों में बाँट गया। श्वेताम्बर सफेद वस्त्र पहनते हैं, जबकि दिगम्बर नंगे रहते हैं।
प्रश्न 3. सांची के स्तूप के संरक्षण में भोपाल की बेगमों की भूमिका की चर्चा कीजिए। अथवा, “सांची के स्तूप के अवशेषों के संरक्षण में भोपाल की बेगमों ने बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।” प्रमाणित कीजिए।
उत्तर- सांची के स्तूप के संरक्षण में भोपाल की बेगमों की भूमिका–
- भोपाल के शासकों, शाहजहाँ बेगम और उनकी उत्तराधिकारी सुल्तानजहाँ बेगम का सांची स्तूप के संरक्षण में महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। उन्होंने प्राचीन स्थल के रख-रखाव के लिए आर्थिक अनुदान दिया।
- जॉन मार्शल द्वारा सांची के स्तूप पर लिखे गए विस्तृत ग्रंथ के प्रकाशन में सुल्तानजहाँ बेगम ने अनुदान दिया। यही कारण था कि जॉन मार्शल ने अपने महत्त्वपूर्ण ग्रंथों को सुल्तानजहाँ को समर्पित किया।
- सुल्तानजहाँ बेगम ने वहाँ पर एक संग्रहालय और अतिथिशाला बनाने के लिए भी अनुदान दिया।
- भोपाल की बेगमों के प्रयास से सांची का स्तूप सुरक्षित रहा और किसी अन्य के हाथ में नहीं जा सका।
प्रश्न 4. निम्नलिखित संक्षिप्त अभिलेख को पढ़िए और जवाब दीजिए:
महाराजा हुविष्क (एक कुषाण शासक) के तैंतीसवें साल में गर्म मौसम के पहले महीने के आठवें दिन त्रिपिटक जानने वाले भिक्खु बल की शिष्या, त्रिपिटक जानने वाली बुद्धमिता के बहन की बेटी भिक्खुनी धनवती ने अपने माता-पिता के साथ मधुवनक में बोधिसत्त की मूर्ति स्थापित की।
- (क) धनवती ने अपने अभिलेख की तारीख कैसे निश्चित की?
- (ख) आपके अनुसार उन्होंने बोधिसत्त की मूर्ति क्यों स्थापित की?
- (ग) वे अपने किन रिश्तेदारों का नाम लेती है?
- (घ) वे कौन-से बौद्ध ग्रंथों को जानती थी?
- (ङ) उन्होंने ये पाठ किससे सीखे थे?
उत्तर-
- (क) धनवती ने अपने अभिलेख की तारीख हुविष्क (कुषाण शासक) के शासन काल के आधार पर निश्चित की। यह अभिलेख हुविष्क के शासन के तैंतीसवें वर्ष अर्थात् 138 सा०यु० में उत्कीर्ण किया गया।
- (ख) धनवती ने बोधिसत्त की मूर्ति बौद्ध धर्म और बुद्ध के सम्मान में स्थापित की।
- (ग) धनवती अपनी मौसी बुद्धमिता और अपने माता-पिता का नाम लेती है।
- (घ) धनवती को त्रिपिटक का ज्ञान था।
- (ङ) उसने यह पाठ बुद्धमिता से सीखा था।
प्रश्न 5. आपके अनुसार स्त्री-पुरुषा संघ में क्यों जाते थे?
उत्तर- स्त्री-पुरुष के संघ में शामिल होने के निम्नलिखित कारण थे –
- वे बुद्ध की शिक्षाओं से प्रभावित थे।
- वे बौद्ध धर्म की शिक्षाओं का प्रचार करना चाहते थे।
- कई स्त्रियाँ धम्म की उपदेशिकाएँ बन गई थी।
- वे थेरी बनना चाहते थे अर्थात् निर्वाण प्राप्त करना चाहते थे।
- वे प्रचलित धार्मिक प्रथा (वैदिक धर्म) से खुश नहीं थे और उसे समाप्त करना चाहते थे।
प्रश्न 6. सांची की मूर्तिकला को समझने में बौद्ध साहित्य के ज्ञान से कहाँ तक सहायता मिलती है?
उत्तर- सांची की मूर्तिकला को समझने में बौद्ध साहित्य के ज्ञान का योगदान–
1. बौद्ध साहित्य के जातकों में अनेक कहानियाँ दी गई हैं। सांची की मूर्तियों को इनसे जोड़ा जाता है। उदाहरणार्थ-सांची की मूर्तिकला में ऐसा दृश्य है जो वेसान्तर जातक से मिलता है। इसमें एक दानी राजकुमार अपना सब कुछ एक ब्राह्मण को सौंपकर जंगल में चला जाता है।
2. सांची की मूर्तिकला को समझने के लिए इतिहासकारों को बुद्ध के चरित्र लेखन से भी सहायता मिलती है। बौद्ध चरित्र लेखन के अनुसार एक वृक्ष के नीचे ध्यान करते हुए बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई। कई प्रारंभिक मूर्तिकारों ने बुद्ध को मानव रूप में न दिखाकर उनकी उपस्थिति प्रतीकों के माध्यम से दर्शाने का प्रयास किया। उदाहरण के लिए रिक्त स्थान से।
3. बुद्ध के ध्यान की दशा तथा स्तूप परिनिर्वाण के प्रतीक बन गये। चक्र का भी प्रतीक के रूप में प्रयोग किया गया है। यह बुद्ध द्वारा सारनाथ में दिए गए पहले उपदेश का प्रतीक था।
4. सांची की मूर्तिकला को समझने के लिए इतिहासकारों को लोक परम्परा को समझना पड़ता है। सांची में एक जैसी अनेक मूर्तियाँ उत्कीर्ण हैं। इनका सीधा संबंध बौद्ध धर्म से नहीं है। कुछ सुन्दर स्त्रियाँ जो तोरणद्वारों के किनारे एक पेड़ पकड़कर झूल रही हैं। इसे शालभंजिका की मूर्ति कहा जाता है। यह उर्वराशक्ति की प्रतीक है।
5. सांची के स्तूप में कई स्थानों पर हाथी, घोड़े, बंदर और गाय, बैल आदि उत्कीर्ण हैं। संभवतः ये मूर्तियाँ मनुष्य के गुणों की प्रतीक हैं। उदाहरणार्थ की मूर्ति शक्ति का प्रतीक है।
प्रश्न 7. चित्र 4.2 और 4.3 में सांची से लिए एक दो परिदृश्य दिए गए हैं आपको इनमें क्या नजर आता है? वास्तुकला, पेड़-पौधे, और जानवरों को ध्यान से देखकर तथा लोगों के काम-धंधों को पहचान कर यह बताइए कि इनमें से कौन-से ग्रामीण और कौन-से शहरी परिदृश्य हैं?
उत्तर- चित्र 4.2 में कुछ स्त्रियों को आभूषण धारण किये हुए दिखाया गया है। इस चित्र की बायीं ओर दो झोपड़ियाँ हैं। इनके दरवाजे पर स्त्रियाँ बैठी हुई हैं। इसमें कुछ जानवरों यथा-हिरण, भैंस और घास-फूस की आकृतियाँ हैं। इसमें कुछ योद्धाओं के चित्र हैं जो धनुष-बाण धारण किये हैं और इसके बायीं ओर एक पेड़ है। इसके नीचे सम्भवतः तालाब है जिसमें भैंसे नहा रही हैं। कुछ फर्न और शैवाल भी दिखाये गये हैं। इसके नीचे रेलिंग है। निश्चित रूप से यह ग्रामीण परिदृश्य है।
चित्र 4.3 में सुन्दर पक्के स्तम्भ हैं जिसके ऊपर विभिन्न जानवर यथा-घोड़े, हाथी, शेर आदि दिखाये गये हैं। सम्भवतः यह एक हाल है जिसमें नृत्य संगीत का कार्यक्रम चल रहा है और नगरवासी एकत्रित हैं। नीचे भी वही दृश्य है परंतु भवन के झरोखे भी दिखाई दे रहे हैं। यह निश्चित रूप से शहरी परिदृश्य है।
प्रश्न 8. वैष्णववाद और शैववाद के उदय से जुड़ी वास्तुकला और मूर्तिकला के विकास की चर्चा कीजिए।
उत्तर- वैष्णववाद और शैववाद के उदय से जुड़ी वास्तुकला और मूर्तिकला का विकास: वैष्णववाद वह मत है जिसमें भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। विष्णुवाद के अनुयायी विष्णु को सर्वोच्च मानते हैं तथा हरि के नाम से पुकारते हैं। उनकी बड़ी श्रद्धा से पूजा करते हैं।
ऐसा माना जाता है कि विष्णु ने भिन्न-भिन्न समय पर भिन्न-भिन्न रूपों में इस धरती पर अवतार लिये। यह अवतार कभी मानव तथा कभी पशु के रूप में प्रकट होते थे। भगवान विष्णु विश्व को संकट से मुक्त कराने के लिए धरती पर बार-बार जन्म लेते हैं। इन अवतारों की संख्या दस है:
- मत्स्य
- कूर्म
- वराह
- नरसिंह
- वामन
- परशुराम
- राम
- कृष्ण
- बुद्ध
- कल्कि।
विष्णु की भक्ति से सम्पूर्ण मानव जाति को सुख प्राप्त होता है। विष्णु के कई अवतारों को मूर्तियों के रूप में दिखाया गया है। दूसरे देवताओं की भी मूर्तियों बनाई गईं। शिव को उनके प्रतीक लिंग के रूप में बनाया जाता था। लेकिन उन्हें कई बार मनुष्य के रूप में दिखाया गया है।
शैववाद में शिव और पार्वती की पूजा की जाती है। लगता है शैववाद सैन्धव सभ्यता से आरंभ हो गया था। वहाँ से अनेक शिवलिंग मिले हैं। शैववाद का उदय ऋग्वेद में दिये गये रुद्र के विचार से हुआ है। शिवजी को नृत्य का देवता अथवा नटराज भी कहते हैं।
शैव मत के अनुयायी शिव व पार्वती को महादेव और महादेवी कहते हैं। पार्वती सुन्दरता तथा नम्रता की देवी है। उसकी दुर्गा अथवा काली के रूप में भी पूजा की जाती है। कुछ शिवभक्त शिव के प्रतीक लोहे के त्रिशूल हाथ में उठाये रखते हैं। अन्य शिवभक्त शिवजी की लिंग के रूप में पूजा करते हैं।
उत्तरी भारत में शिवजी की कई अन्य रूपों में पूजा की जाती है जैसे कि रूद्र, नानीरुद्र, नंदीश, हर, नरेन्द्र, महाकाल, भैरव आदि । आरंभिक शैववाद को पशुपति संप्रदाय कहा जाता था । अर्थात् उन्हें पशुओं का देवता माना जाता था। शिव को बाद में स्वामी अथवा पति माना जाता था इन्हें जीवों को मुक्ति प्रदाता समझा जाता था।
प्रश्न 9. स्तूप क्यों और कैसे बनाये जाते थे? चर्चा कीजिए।
उत्तर- स्तूप निर्माण के कारण:
स्तूप एक पवित्र स्थान माना जाता है क्योंकि इन स्थानों पर महात्मा बुद्ध की अस्थियाँ या उससे सम्बन्धित वस्तुएँ दबायी गई हैं। टीलेनुमा इन स्तूपों की बुद्ध तथा बौद्धधर्म के प्रतीक मानकर पूजा की जाती थी।
अशोकावदान से ज्ञात होता है कि अशोक ने सभी प्रसिद्ध नगरों में स्तूप बनाने का आदेश दिया था। भरहुत, सांची सारनाथ के स्तूप सा०यु०पू० द्वितीय शताब्दी तक बन गये थे।
स्तूप निर्माण की विधि:
इन स्तूपों का निर्माण दान द्वारा किया गया था। दान देने वालों में राजा, शिल्पकार और व्यापारी आदि शामिल थे। इसमें कुछ पुरुष, महिलायें, भिक्षुक और भिक्षुणियाँ भी शामिल थीं। आरंभ में स्तूप अर्द्धगोलाकार रूप में जमाई गई मिट्टी के बनाए जाते थे।
इसे अंड भी कहने थे। आगे चलकर इसमें अनेक वस्तुएँ जुड़ गईं। यह चौकोर और गोल आकारों का मिश्रित रूप बना। अंड के ऊपर छज्जे जैसी आकृति या हर्मिक बनने लगी थी। इसको देवताओं का निवा: माना जाता था। हर्मिका से एक मस्तूल निकलता था जिसे यष्टि कहते थे। स्तूप के चारों ओर वेदिका होती थी। सांची और भरहुत के स्तूपों में तोरणद्वार और वेदिकायें हैं। ये बांस या लकड़ी के घेरे होते थे। इसी प्रकार की कुछ अन्य संरचनायें कुछ दूसरे स्तूपों में मिलती हैं।
प्रश्न 10. विश्व के रेखांकित मानचित्र पर उन इलाकों पर निशान लगाइये जहाँ बौद्ध धर्म का प्रसार हुआ। उपमहाद्वीप से इन इलाकों को जोड़ने वाले जल और स्थल मार्गों को दिखाइये।
उत्तर-
प्रश्न 11. इस अध्याय में चर्चित धार्मिक परम्पराओं में से क्या कोई परम्परा आपके अड़ोस-पड़ोस में मानी जाती है? आज किन धार्मिक ग्रंथों का प्रयोग किया जाता है? उन्हें कैसे संरक्षित और संप्रेषित किया जाता है? क्या पूजा में मूर्तियों का प्रयोग होता है? यदि हाँ तो क्या ये मूर्तियाँ इस अध्याय में लिखी गई मूर्तियों से मिलती-जुलती हैं या अलग हैं? धार्मिक कृत्यों के लिए प्रयुक्त इमारतों की तुलना प्रारंभिक स्तूपों और मंदिरों से कीजिए।
उत्तर- छात्र स्वयं करें।
प्रश्न 12. इस अध्याय में वर्णित धार्मिक परम्पराओं से जुड़े अलग-अलग काल और इलाकों की कम से पाँच मूर्तियों और चित्रों की तस्वीरें इकट्ठी कीजिए। उनके शीर्षक हटाकर प्रत्येक दो लोगों को दिखाइए और उन्हें इसके बारे में बताने को कहिए। उनके वर्णनों की तुलना करते हुए अपनी खोज रिपोर्ट लिखिए।
उत्तर- छात्र स्वयं करें।
0 Comments