| 10. उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन |
प्रश्न 1. ग्रामीण बंगाल के बहुत से इलाकों में जोतदार एक ताकतवर हस्ती क्यों था?
उत्तर- ग्रामीण बंगाल के बहुत से इलाकों में जोतदार एक ताकतवर हस्ती था। इसके निम्नलिखित कारण थे-
- बंगाल के दिनाजपुर जिले के धनी किसानों को जोतदार कहा जाता था। इनके पास जमीन के बड़े-बड़े रकबे होते थे। कहीं-कहीं तो यह हजारों एकड़ का होता था।
- स्थानीय व्यापार और साहूकार के कारोबार पर इनका नियंत्रण था। वे क्षेत्र के गरीब काश्तकारों पर शक्ति प्रयोग करते थे।
- ये लोग गाँवों में रहते थे और गरीब ग्रामीणों के बड़े वर्ग:पर नियंत्रण रखते थे।
- ये किसानों के पक्षधर और लगान बढ़ाए जाने के मुद्दे पर जमींदार के कट्टर विरोधी थे। ये अंग्रेज अधिकारियों के कार्यों पर रोक भी लगाते थे।
- ये खुद खेती नहीं करते थे और अपनी जमीन बटाईदारों को खेती करने के लिए दे देते थे। उनसे वे उपज का आधा भाग लेते थे। इस प्रकार ये बिना मेहनत धनवान हो जाते थे।
प्रश्न 2. जमींदार लोग अपनी जमींदारियों पर किस प्रकार नियंत्रण बनाए रखते थे?
उत्तर- जमींदारों द्वारा अपनी जमींदारियों पर नियंत्रण रखने के उपाय–
- राजस्व की अत्यधिक माँग और अपनी भूसम्पदा की नीलामी से जमींदार तंग आ गये थे। इससे बचने के लिए जमींदारों ने नया षड्यंत्र सोच लिया। संपदा की फर्जी बिक्री ऐसी ही एक रणनीति थी।
- बर्दमान के राजा ने पहले तो अपनी जमींदारी का कुछ भाग अपनी माँ के नाम कर दिया क्योंकि कंपनी ने यह नियम बनाया था कि स्त्रियों की सम्पत्ति को छीना नहीं जायेगा।
- नीलामी की प्रक्रिया में एजेंटों और नौकरों को शामिल किया गया। इस प्रकार संपदा पर जमींदार का अधिकार बना रहता था।
- जमींदार कंपनी को राजस्व समय पर नहीं देते थे और इस प्रकार बकाया राजस्व राशि का बोझ बढ़ता गया। जब भूसंपदा का कुछ भाग नीलाम किया गया तो जमींदार के संबंधियों ने ही ऊँची बोली लगाकर खरीद लिया परंतु रकम का भुगतान नहीं किया। यही प्रक्रिया बार-बार चलती रही।
- कुछ दिनों के बाद लोगों ने बोली लगाना बंद कर दिया। कंपनी को कम दाम पर जमीन जमींदार को बेचनी पड़ी।
- जमींदारों ने नीलामी से बचने के लिए अन्य कई तरकीबें निकालीं। वे संपदा खरीदने वालों को जमीन पर कब्जा नहीं करने देते थे या मार-पीटकर भगा देते थे।
प्रश्न 3. पहाडिया लोगों ने बाहरी लोगों के आगमन पर कैसी प्रतिक्रिया दर्शाई?
उत्तर- स्थायी कृषि विस्तार के साथ बाहरी लोगों और पहाड़ियों के बीच संघर्ष तेज हो गया था। वे ग्रामवासियों का अनाज और पशु झपटने लगे।
- 1770 ई. के दशक में ब्रिटिश अधिकारियों ने पहाड़ियों के प्रति कठोरता की नीति अपनाई और उन पर आक्रमण शुरू कर दिया।
- 1780 के दशक के भागलपुर के कलक्टर ऑगस्ट्स क्लीवलैंड ने शांति स्थापना का प्रस्ताव रखकर पहाड़ी मुखियाओं का वार्षिक भत्ता निश्चित किया ताकि वे अपने आदमियों को नियंत्रण में रख सकें। पहाड़िया लोग अंग्रेजों को सन्देह की दृष्टि से देखने लगे और उनसे घृणा करने लगे।
- पहाड़ियों के लिए एक अन्य खतरा इनके क्षेत्रों में संस्थालों का प्रवेश बन गया । जहाँ कुदाल पहाड़ियों की रक्षक थी, वहीं हल संथालों का सुदृढ़ अस्त्र बन गया। अब इन दोनों के बीच संघर्ष शुरू हो गया।
प्रश्न 4. संथालों ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध विद्रोह क्यों किया?
उत्तर- संथालों द्वारा ब्रिटिश शासन के विरुद्ध-विद्रोह के कारण:
- ब्रिटिश अधिकारियों ने संथालों को दामिन-इ-कोह में बसने के लिए निमंत्रण दिया । यहाँ संथालों के गाँवों और जनसंख्या में तेजी से वृद्धि हुई। वे व्यापारिक फसलों की खेती करते थे परंतु ब्रिटिश सरकार ने उनकी जमीन पर भारी कर लगा दिया।
- 1850 ई. के दशक तक संथाल लोग स्वायत्त शासन चाहते थे परंतु ब्रिटिश सरकार इसके लिए तैयार नहीं की। फलस्वरूप संथालों ने विद्रोह कर दिया।
- 1855-56 के संथाल विद्रोह के बाद संथाल परगने का निर्माण कर दिया गया। इस प्रकार उनका क्षेत्र सीमित कर दिया गया।
प्रश्न 5. दक्कन के रैयत ऋणदाताओं के प्रति क्रुद्ध क्यों थे?
उत्तर- दक्कन के रैयत का ऋणदाताओं के प्रति क्रुद्ध होने के कारण–
1. जब भारत से इंग्लैण्ड में कपास का निर्यात हो रहा था तो महाराष्ट्र के निर्यात व्यापारी और साहूकार रैयत को खूब ऋण दे रहे थे। अमेरिका में गृहयुद्ध की समाप्ति और वहाँ से इंग्लैण्ड में कपास का निर्यात पुनः होने से ये ऋणदाता ऋण देने में उत्सुक नहीं रहे। यह भी एक कारण था कि दक्कन के रैयत क्रुद्ध हो गये।
2. ऋणदाताओं ने देखा कि भारतीय कपास की माँग घटती जा रही है और कपास की कीमतों में भी गिरावट आ रही है। यही कारण था कि उन्होंने अपना कार्य व्यवहार बंद करने, रैयत की अग्रिम राशियाँ प्रतिबंधित करने और बकाया ऋणों को वापस लेने का निर्णय लिया।
3. 1830 ई. के पश्चात् राजस्व का नया बंदोवस्त लागू किया गया जिसमें भूराजस्व 50 से 100 प्रतिशत बढ़ा दिया गया। इतना भारी लगान देने के लिए रैयतों को ऋण लेना अनिवार्य हो गया परंतु ऋणदाताओं ने ऋण देने से मना कर दिया। रैयत इस बात से अधिक नाराज था कि ऋणदाता वर्ग इतना संवेदनहीन हो गया है कि वह उनकी हालत पर कोई तरस नहीं खा रहा है और गाँव की प्रथाओं का उल्लंघन कर रहा है।
प्रश्न 6. इस्तमरारी बंदोबस्त के बाद बहुत सी जमींदारियाँ क्यों नीलाम कर दी गई?
उत्तर- इस्तमरारी बंदोबस्त के बाद बहुत सी जमींदारियों के नीलाम होने के कारण–
1. 1793 ई. में चार्ल्स कार्नवालिस द्वारा इस्तमरारी बंदोबस्त लागू कर दिया गया। इसके अंतर्गत निश्चित भूराजस्व लम्बे समय के लिए निर्धारित कर दिया गया और इसे निश्चित तिथि पर भुगतान करना होता था। निश्चित भूराजस्व जमा न करने पर जमींदारों की भूमि नीलाम कर दी जाती थी।
2. बंगाल में राजस्व के भुगतान की समस्या बढ़ती जा रही थी जबकि ब्रिटिश अधिकारी यह आशा कर रहे थे कि इस्तमरारी बंदोबस्त लागू होने के पश्चात् यह समस्या हल हो जायेगी। वस्तुतः 1770 ई. के पश्चात् बंगाल में बार-बार अकाल पड़ रहे थे एवं खेती की पैदावार घटती जा रही थी। इसलिए किसान भूराजस्व नहीं दे पा रहे थे। ऐसे में जमींदार भी भूराजस्व देने में असमर्थ हो जाते थे। फिर तो भूमि का नीलाम होना निश्चित था।
3. जमींदारों के अधीन अनेक गाँव यहाँ तक कि 400 गाँव भी होते थे। कई गाँव मिलकर एक जमींदार के अधीन राजस्व सम्पदा बनाते थे। इस संपदा पर कंपनी राजस्व की कुल माँग का निर्धारण करती थी। इसके बाद जमींदार अलग-अलग गाँवों के लिए भूराजस्व निश्चित करता था और वसूल करता था। इस प्रकार यह एक जटिल कार्य था। जब जमींदार निर्धारित राजस्व को समय पर जमा न कर पाता था तो उनकी संपदा (भूमि) का नीलाम कर दिया जाता था।
प्रश्न 7. पहाडिया लोगों की आजीविका संथालों की आजीविका से किस रूप में भिन्न थी?
उत्तर- पहाड़िया लोगों और संथालों की आजीविका में अंतर–
1. 18 वीं शताब्दी के परवर्ती दशकों के राजस्व अभिलेखों से ज्ञात होता है कि पहाड़िया जंगल की उपज से अपनी जीविका चलाते थे और झूमकर खेती किया करते थे। जंगल को साफ करके बनाई गई जमीन पर लोग खाने के लिए विभिन्न प्रकार की दालें और ज्वार-बाजरा उगा लेते थे। कुछ वर्षों तक उस साफ की गई जमीन पर खेती करते थे और फिर उसे परती छोड़कर नये इलाके में चले जाते थे। जमीन की खोई हुई उर्वरता फिर से लौट आए, इसीलिए ऐसा किया जाता था। संथाल लोग स्थायी खेती करते थे। वे परिश्रम से जंगल को साफ करके खेतों की जुताई करते थे। इनकी जमीन चट्टानी थी लेकिन उपजाऊ थी। बुकानन के अनुसार वहाँ तम्बाकू और सरसों की अच्छी खेती होती थी।
2. पहाड़िया लोग गुजारे वाली और खाद्य पदार्थों की खेती अधिक करते थे जबकि संथाल लोग व्यापारिक और नकदी फसलों की खेती करते थे।
3. पहाड़िया लोग जंगल साफ करने और खेती करने के लिए कुदाल का प्रयोग करते थे। वे जंगल काटने के लिए हल का प्रयोग नहीं करते थे और उपद्रवी थे। इसके विपरीत संथाल आदर्श बाशिंदे थे, क्योंकि उन्हें जंगलों का सफाया करने में कोई हिचक नहीं थी और वे भूमि की गहरी जुताई करते थे।
4. जंगलों में पहाड़िया लोग खाने के लिए महुआ के फूल, बेचने के लिए रेशम के कोया और राल और काठ कोयला बनाने के लिए लकड़ियाँ, एकत्र करते थे। संथाल लोग इस प्रकार का कार्य नहीं करते थे।
5. पहाड़िया लोग प्रायः उन मैदानों पर आक्रमण किया करते थे जहाँ के स्थाई किसान खेती-बाड़ी करते थे। अभाव या अकाल के वर्षों में स्वयं को जीवित रखने के लिए ऐसे आक्रमण किये जाते थे। संथाल लोग इस प्रकार के कार्यों में रुचि नहीं लेते थे।
6. मैदानों में रहने वाले जमींदार पहाड़ी मुखियाओं को नियमित रूप से खिराज देकर उनसे शांति खरीदनी पड़ती थी। पहाड़िया लोग व्यापारियों से पथकर लिया करते थे। पथकर लेकर वे व्यापारियों की रक्षा करते थे। संथाल ऐसा कार्य नहीं करते थे।
प्रश्न 8. अमेरिकी गृहयुद्ध ने भारत में रैयत समुदाय के जीवन को कैसे प्रभावित किया?
उत्तर- अमेरिकी गृहयुद्ध का भारत में समुदाय के जीवन पर प्रभाव–
1. 1860 के दशक से पूर्व ब्रिटेन अमेरिका से कपास आयात करता था जिसके बंद होने की आशंका बनी रहती थी।1857 में ब्रिटेन में कपास आपूर्ति संघ की स्थापना हुई। इसका उद्देश्य कंपनी की आय बढ़ाने के लिए विश्व के प्रत्येक भाग में कपास के उत्पादन को प्रोत्साहित करना था। भारत को ऐसा देश समझा गया जो अमेरिका से कपास की आपूर्ति बंद हो जाने की स्थिति में ब्रिटेन को कपास भेज सकता है। भारत से कपास का निर्यात, सस्ते दामों पर ब्रिटेन को होता था। रैयतों को इससे बहुत घाटा उठाना पड़ता था।
2. 1861 में अमेरिकी गृह-युद्ध छिड़ने के कारण कपास में कमी आने लगी और उसका दाम बढ़ने लगा। भारत और अन्य देशों से कपास की आपूर्ति होने लगी। इसके कारण भारतीय रैयतों को कपास का अच्छा दाम मिलने लगा।
3. दक्कन में किसानों को कपास उगाने के लिए खूब ऋण दिया गया । फलस्वरूप दक्कन से कपास के उत्पादन में पर्याप्त वृद्धि हुई।
4. इंग्लैंड में कपास के कुल आयात का 90% भाग भारत से आयात होता था। परंतु कपास की उत्पादन की वृद्धि से भी रैयतों को पर्याप्त लाभ नहीं हुआ। वे कर्ज में दबे रहे।
5. 1865 ई. तक अमेरिका में शांति बहाल होने के साथ ही ब्रिटेन में अमेरिका से कपास पुनः आने लगी। इसके कारण भारतीय कपास के निर्यात में कमी आ गई। महाराष्ट्र में साहूकारों ने कर्ज देना बंद कर दिया और किसानों से ऋणों की वसूली करने लगे। इस प्रकार रैयतों को ऋण मिलना भी बंद हो गया और वे तबाह होने लगे।
प्रश्न 9. किसानों का इतिहास लिखने में सरकारी स्रोतों के उपयोग के बारे में क्या समस्याएँ आती हैं?
उत्तर- किसानों का इतिहास लिखने में सरकारी स्रोतों के उपयोग के विषय में आने वाली समस्याएँ:
किसानों का इतिहास लिखने में सरकारी स्रोतों के उपयोग के बारे में अनेक समस्याएँ आती हैं जो निम्नलिखित हैं–
1. सरकारी स्रोत सरकार के कार्यों से सम्बद्ध होते हैं। किसानों के बारे में इनसे विस्तृत और सही रिपोर्ट नहीं मिलती है।
2. सरकारी स्रोत में उल्लिखित विवरण सरकार के पक्ष में होते हैं। उसमें सरकारी कमियों को नहीं दिखाया जाता था। किसानों के हित की बात की जाती है परंतु अहित के बारे में नहीं लिखा जाता।
3. सरकारी स्रोत घटनाओं के बारे में सरकारी सरोकार और अर्थ प्रतिबिंबित करते हैं। उदाहरण के लिए-दक्कन दंगा आयोग से विशिष्ट रूप से यह जाँच करने के लिए कहा गया था कि क्या सरकारी राजस्व की माँग का स्तर विद्रोह का कारण था।
4. संपूर्ण प्रमाण प्रस्तुत करने के बाद आयोग ने यह सूचित किया था कि सरकारी माँग किसानों के गुस्से की वजह नहीं थी। इसमें पूरा दोष ऋणदाताओं या साहूकारों का ही था, जबकि ऐसा नहीं था। इसमें सरकारी माँग बहुत कुछ उत्तरदायी थी। ब्रिटिश सरकार यह मानने को कभी तैयार नहीं थी कि जनता में असंतोष या क्रोध सरकारी कार्यवाही के कारण उत्पन्न हुआ था।
5. सरकारी रिपोर्ट किसानों के इतिहास के पुनर्निर्माण के लिए उपयोगी है परंतु उन्हें सावधानीपूर्वक पढ़ना पड़ेगा अन्य का तथ्य गलत हो सकते हैं।
6. सरकारी स्रोतों से प्राप्त जानकारी का समाचारपत्रों, गैर सरकारी वृत्तान्तों, विधिक अभिलेखों और यथासंभव मौखिक स्रोतों से संकलित साक्ष्य के साथ मिलान करके उनकी विश्वसनीयता की जाँच करनी पड़ेगी।
प्रश्न 10. उपमहाद्वीप के बाह्यरेखा मानचित्र (खाके) में इस अध्याय में वर्णित क्षेत्रों को अंकित कीजिए। यह भी पता लगाइये कि क्या ऐसा भी कोई इलाका था जहाँ इस्तमरारी बंदोबस्त और रैयतवाड़ी व्यवस्था लागू थी। ऐसे इलाकों को मानचित्र में भी अंकित कीजिए।
उत्तर-
प्रश्न 11. फ्रांसिस बुकानन ने पूर्वी भारत के अनेक जिलों के बारे में रिपोर्ट प्रकाशित की थी। उनमें से एक रिपोर्ट पढ़िए और इस अध्याय में चर्चित विषयों पर ध्यान केंद्रित करते हुए उस रिपोर्ट में ग्रामीण समाज के बारे में उपलब्ध जानकारी को संकलित कीजिए। यह भी बताइए कि इतिहासकार लोग ऐसी रिपोर्टों का किस प्रकार उपयोग कर सकते हैं।
उत्तर- छात्र स्वयं करे।
प्रश्न 12. आप जिस क्षेत्र में रहते हैं, वहाँ के ग्रामीण समुदाय के वृद्धजनों से चर्चा कीजिए और उन खेतों में जाइए जिन्हें वे अब जोतते हैं। यह पता लगाइए कि वे क्या पैदा करते हैं, वे अपनी रोजी-रोटी कैसे कमाते हैं, उनके माता-पिता क्या करते थे, उनके बेटे-बेटियाँ अब क्या करते हैं और पिछले 75 सालों में उनके जीवन में क्या-क्या परिवर्तन आए हैं। अपने निष्कर्षों के आधार पर एक रिपोर्ट तैयार कीजिए।
उत्तर- छात्र स्वयं करें।
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