| 9. मनोविज्ञान कौशलों का विकाश |
प्रश्न 1. एक सेवार्थी-परामर्शदाता संबंधों के नैतिक मानदंड क्या है?
उत्तर-
1. भौतिक/व्यावसायिक आचरण-संहिता, मानक तथा दिशा-निर्देशों का ज्ञान: संविधियों, नियमों एवं अधिनियमों की जानकारी के साथ मनोविज्ञान के लिए जरूरी कानूनों की जानकारी भी आवश्यक है।
2. विभिन्न नैदानिक स्थितियों में नैतिक एवं विधिक मुद्दों को पहचानना और उनका विश्लेषण करना।
3. नैदानिक स्थितियों में अपनी अभिवृत्तियों एवं व्यवहार को नैतिक विमाओं को पहचानना और समझना।
4. जब भी नैतिक मुद्दों का सामना हो तब उपयुक्त सूचनाओं एवं।
5. नैतिक मुद्दों से संबंधित उपयुक्त व्यावसायिक आग्रहिता।
प्रश्न 2. साक्षात्कार कौशल को संक्षेप में समझाइए।
उत्तर- एक साक्षात्कार दो या अधिक व्यक्तियों के बीच एक उद्देश्यपूर्ण वार्तालाप है जिसमें प्रश्न-उत्तर प्रारूप या फॉमेंट का अनुसरण किया जाता है। साक्षात्कार अन्य प्रकार के वार्तालाप की तुलना में अधिक औपचारिक होता है क्योंकि इसका एक पूर्वनिर्धारित उद्देश्य होता है तथा उसकी संरचना केंद्रित होती है। अनेक प्रकार के साक्षात्कार होते हैं। उनमें से एक रोजगार साक्षात्कार है जिसका अनुभव हममें से अधिकांश लोग करेंगे। अन्य प्रारूपों में सूचना संग्रह संबंधी साक्षात्कार, परामर्शी साक्षात्कार पूछताछ संबंधी साक्षात्कार, रेडियो-टेलीविजन के साक्षात्कार तथा शोध साक्षात्कार आते हैं।
प्रश्न 3. संप्रेषण को परिभाषित कीजिए। संप्रेषण प्रक्रिया का कौन-सा घटक सबसे महत्त्वपूर्ण है? अपने उत्तर को प्रासंगिक उदाहरणों से पुष्ट कीजिए।
उत्तर- संप्रेषण एक सचेतन या अचेतन, साभिप्राय या अनभिप्रेत प्रक्रिया है जिसमें भावनाओं तथा विचारों को, वाचिक या अवाचिक संदेश के रूप में भेजा, ग्रहण किया और समझा जाता है। श्रवण संप्रेषण प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण घटक है। श्रवण एक महत्त्वपूर्ण कौशल है जिसका उपयोग हम प्रतिदिन करते हैं। शैक्षिक सफलता, नौकरी की उपलब्धि एवं व्यक्तिगत प्रसन्नता काफी हर तक हमारे प्रभावी ढंग से सुनने की योग्यता पर निर्भर करती है। प्रथमतया, श्रवण हमें एक निष्क्रिय व्यवहार लग सकता है क्योंकि इसमें चुप्पी होती है लेकिन निष्क्रियता की यह छवि सच्चाई से दूर है। श्रवण में एक प्रकार की ध्यान सक्रियता होती है। सुनने वाले धैर्यवान तथा अनिर्णायाताक होने के साथ विश्लेषण करते रहना पड़ता है ताकि सही अनुक्रिया दी जा सके।
प्रश्न 4. श्रवण में संस्कृति की भूमिका को समझाइए।
उत्तर- श्रवण में संस्कृति की भूमिका-मस्तिष्क की तरह और हम जिस संस्कृति में पलते बढ़ते हैं वह भी हमारी श्रवण एवं सीखने की योग्यताओं को प्रभावित करती है। एशियाई संस्कृति, जैसे कि भारत में जब बड़े या वरिष्ठ लोग संदेश देते हैं तब उसकी शांत संप्रेषक की तरह ग्रहण किया जाता है। कुछ संस्कृतियाँ में ध्यान को नियंत्रित करने पर ध्यान दिया जाता है। उदाहरण के लिए, बौद्ध दर्शन में एक संप्रत्यय होता है जिसको ‘मनोयोग’ कहते हैं। इसका अर्थ है कि आप जो भी करें, उस पर अपना संपूर्ण ध्यान केंद्रित रखें। बाल्यावस्था में ‘मनोयोग’ का प्रशिक्षण देने से ध्यान केंद्रित करने की योग्यता का विस्तार हो जाता है और इससे श्रवण की क्षमता बेहतर हो जाती है। व्यक्ति में इससे सहानुभूति श्रवण की योग्यता भी बढ़ती है। फिर भी अनेक संस्कृतियों में श्रवण कौशलों में बढ़ोत्तरी से जुड़े संप्रत्ययों को अभाव है।
प्रश्न 5. परामर्शी साक्षात्कार का विशिष्ट प्रारूप क्या है?
उत्तर- परामर्शी साक्षात्कार के विशिष्ट प्रारूप इसे प्रकार से होते हैं:
1. साक्षात्कार का प्रारंभ:
इसका उद्देश्य यह होता है कि साक्षात्कार देनेवाला आराम की स्थिति में आ जाए। सामान्यतः साक्षात्कारकर्ता बातचीत की शुरुआत करता है और प्रारंभिक समय में ज्यादा बात करता है।
2. साक्षात्कार का मुख्य भाग:
यह इस प्रक्रिया का केन्द्र है। इस अवस्था में साक्षात्कारकर्ता सूचना और प्रदत्त प्राप्त करने के उद्देश्य से प्रश्न पूछने का प्रयास करता है जिसके लिए साक्षात्कार का आयोजन किया जाता है।
3. प्रश्नों का अनुक्रम:
साक्षात्कारकर्ता प्रश्नों की सूची तैयार करता है जिसमें विभिन्न क्षेत्रों या श्रेणियों से जो वह जानना चाहता है, प्रश्न होते हैं।
4. साक्षात्कार का समापन:
साक्षात्कार का समापन करते समय साक्षात्करकर्ता ने जो संग्रह किया है उसे उसाक सारांश बताना चाहिए। साक्षात्कार का अंत आगे के लिए जानेवाले कदम पर चर्चा के साथ होना चाहिए। जब साक्षात्कार समाप्त हो रहा हो तब साक्षात्कारकर्ता को साक्षात्कार देनेवाले को भी प्रश्न पूछने का अवसर देना चाहिए या टिप्पणी करने का मौका देना चाहिए।
प्रश्न 6. परामर्श से आप क्या समझते हैं? एक प्रभावी परामर्शदाता की विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर- साक्षात्कार की योजना, सेवार्थी एवं परामर्शदाता के व्यवहार का विश्लेषण तथा सेवार्थी के ऊपर पड़नेवाले विकासात्मक प्रभाव के निर्धारण के लिए परामर्श एक प्रणाली प्रस्तुत करता है। एक परामर्शदाता इस बात में अभिरुचि रखता है कि वह सेवार्थी की समस्याओं को उसके दृष्टिकोण और भावनाओं को ध्यान में रखकर समझ सके।
इसमें समस्या से जुड़े वास्तविक तथ्य या वस्तुनिष्ठ तथ्य कम महत्त्वपूर्ण होते हैं और यह अधिक महत्त्वपूर्ण होता है कि सेवार्थी द्वारा स्वीकार की गई भावनाएँ कैसी हैं, उनको लेकर काम किया जाए। इसमें व्यक्ति तथा वह समस्या को किस प्रकार परिभाषित करता है, इसको ध्यान में रखा जाता है। परामर्श में सहायतापरक संबंध होता है जिसमें सम्मिलित होता है वह जो मदद चाह रहा है, मदद से रहा है, देने का इच्छुक है, जो मदद देने में सक्षम हो या प्रशिक्षित हो और उस स्थिति में हो जहाँ मदद लेना और देना सहज हो।
एक प्रभावी परामर्शदाता की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं–
1. प्रामाणिकता:
हमारे अपने बारे में प्रत्यक्ष या अपनी छवी हमारे “मैं” को बनाती है। यह स्व प्रत्यक्षित ‘मैं’ हमारे विचारों, शब्दों क्रियाओं, पोशाक और जीवन शैली के माध्यम से अभिव्यक्ति होता है। यह सभी हमारे ‘मैं’ को दूसरों तक संप्रेषित करते हैं। जो हमारे निकट संपर्क में आते हैं वे अपने लिए हमारे बारे में अलग छवि या धारण बनाते हैं और वे कभी-कभी इस छवि को हम तक पहुँचाते भी हैं। उदाहरण के लिए मित्र हमें बताते हैं कि वे हमारे बारे में क्या पसंद या नापसंद करते हैं।
हमारे माता-पिता या अध्यापक हमारी प्रशंसा या आलोचना करते हैं। हम जिनका आप सम्मान करते हैं वे भी आपका मूल्यांकन करते हैं। ये सामूहिक निर्णय उन लोगों के द्वारा जिनका आप सम्मान करते हैं, इनको ‘दूसरे महत्त्वपूर्ण’ भी कहा जा सकता है, एक ‘हम’ का विकास करते हैं। इस ‘हम’ में वह प्रत्यक्षण सम्मिलित है जो दूसरे हमारे बारे में बताते हैं। यह प्रत्यक्षण हमारे स्व-प्रत्यक्षित-‘मैं’ जैसा भी हो सकता है या उससे भिन्न हो सकता है। जहाँ तक हम अपने स्वयं के बारे में अपने प्रत्यक्षण तथा दूसरों के अपने बारे में प्रत्यक्षण के प्रति जितने जानकार एवं सजग है, इससे हमारी आत्म-जागरुकता का पता चलता है। प्रामाणिकता का अर्थ है कि हमारे व्यवहार की अभिव्यक्ति आपको मूल्यों, भावनाओं एवं आंतरिक आत्मबिंब या आत्म-छवि (Self-image) के साथ संगत होती है।
2. दूसरों के प्रति सकारात्मक आदर:
एक उपबोध्य (Counselee) परामर्शदाता संबंध में एक अचछा संबंध अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को प्रोत्साहित करता है। यह इस स्वीकृति को परावर्तित करता है कि दोनों की भावनाएँ महत्त्वपूर्ण हैं। जब हम नए संबंध बनाते हैं तब हम एक अनिश्चितता की भावना एवं दुश्चिता का अनुभव करते हैं। इन भावनाओं को कम किया जा सकता है अगर परामर्शदाता सेवार्थी जैसा महसूस कर रहा हो बारे में एक सकारात्मक आदर का भाव प्रदर्शित करता है। दूसरों के प्रति सकारात्मक आदर का भाव दिखाने के लिए निम्नलिखित दिशा-निर्देशों को ध्यान में रखना चाहिए।
- जब कोई बोल रहा हो तब ‘मैं’ संदेश का उपयोग बनाए न कि ‘तुम’ संदेश की। इसका एक उदाहरण होगा, ‘मैं समझता हूँ’ न कि “आपको/तुमको नहीं चाहिए।”
- दूसरे व्यक्ति को अनुक्रिया तभी देना चाहिए तब व्यक्ति उसकी कही हुई बात को समझ लें।
- दूसरे व्यक्ति को यह स्वतंत्रता देनी चाहिए ताकि वह जैसा महसूस करता है वैसा बता सकें। उसको टोकना या बाधित नहीं करना चाहिए।
- यह मानकर नहीं चलना चाहिए कि दूसरा यह जानता है कि व्यक्ति क्या सोच रहा है। अपने को निर्देश आधार के अनुसार ही व्यक्त करना चाहिए अर्थात् उस संदर्भ के अनुसार जिसमें बातचीत चल रही है।
- स्वयं या दूसरों के ऊपर कोई लेबल लगाना चाहिए (उदाहरणार्थ, “तुम एक अंतर्मुखी व्यक्ति हो” इत्यादि)
3. तदनुभूति:
यह एक सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कौशल है जो परामर्शदाता के पास होना चाहिए। तदनुभूति एक परामर्शदाता की वह योग्यता है जिसके द्वारा वह सेवार्थी की भावनाओं को उसके ही परिप्रेक्ष्य से समझता है। यह दूसरे के जूते में पैर डालने जैसा है, जिसके द्वारा व्यक्ति दूसरों की तकलीफ एवं पीड़ा को महसूस करके समझ सकते हैं। सहानुभूति एवं तनुभूति में अंतर हाता लगता है कि उसकी दया की किसी को जरूरत है।
4. पुनर्वाक्यविन्यास:
इसमें परामर्शदाता उस योग्यता का परिचय देता है कि कैसे सेवार्थी को कही हुई बातों को या भावनाओं को विभिन्न शब्दों को उपयोग करते हुए कहा जा सकता है।
प्रश्न 7. परामर्श के मिथकों का खंडन किस प्रकार करेंगे?
उत्तर- परामर्श के मिथकों का खंडन–
- परामर्श का तात्पर्य केवल सूचना देना नहीं होता है।
- परमर्श केवल सलाह देना नहीं होता है।
- किसी नौकरी या पाठ्यक्रम में चयन या स्थान परामर्श देना नहीं होता है।
- परामर्श. और साक्षात्कार समान नहीं है यद्यपि परामर्श में साक्षात्कार प्रक्रिया का उपयोग किया जा सकता है।
- परामर्श के अंतर्गत अभिवृत्तियों, विश्वासों और व्यवहारों का अनुनय करके, भर्त्सना करके, धमकी देकर या विवश करके प्रभावित करना नहीं आता है।
प्रश्न 8. प्रभावी संबंधों को किस प्रकार विकसित किया जा सकता है?
उत्तर- प्रभावी संबंधों को विकसित करना-अधिकतर लोग जो परामर्शदाता से मदद लेते हैं, उनके प्रभावी या संतोषजनक संबंध बेहद कम होते हैं या उनका पूरी तरह अभाव होता है। चूँकि व्यवहार में परिवर्तन अक्सर सामाजिक अवलंब या समर्थन के एक नेटवर्क से आता है इसके लिए जरूरी है कि सेवार्थी दूसरे व्यक्तियों से अच्छा संबंध विकसित करने पर ध्यान दें। परामर्श संबंध वह माध्यम है जिससे इसका प्रारंभ किया जा सकता है।
हम सभी की तरह परामर्शदाता भी पूर्ण नहीं होते हैं, लेकिन दूसरों की तुलना में स्वस्थ एवं सहायक संबंधों का विकास करने की विशेषताओं में प्रशिक्षण प्राप्त होते हैं। संक्षेप में, परामर्श में सेवार्थी के लिए एक वे अधिक परिणामों की अपेक्षा होती है, जो साथ ही घटित होते हैं। सेवार्थी में होनेवाले प्रभावी व्यवहार परिवर्तन बहुपक्षीय होते हैं। इसको इस रूप से देखा जा सकता है कि सेवार्थी अधिक जिम्मेदारी ले, नई अंतदृष्टि विकसित करे, विभिन्न प्रकार के व्यवहार करे तथा अधिक प्रभावी संबंध विकसित करने का प्रयास करे।
प्रश्न 9. अपने एक मित्र के व्यक्तिगत जीवन के एक ऐसे पक्ष की पहचान कीजिए जिसे वह बदलना चाहता है। अपने मित्र की सहायता करने के लिए मनोविज्ञान के एक विद्यार्थी के रूप में विचार करके उसकी समस्या के समाधान या निराकरण के लिए एक कार्यक्रम को प्रस्तावित कीजिए।
उत्तर- मेरा मित्र धूम्रपान करता है। उसकी यह आदत काफी दिनों से है और पिछले कुछ दिनों में उसकी आदत काफी बढ़ गई है। धूम्रपान के कारण उसके व्यक्तिगत जीवन में कठिनाइयाँ सामने आने लगी हैं। प्रतिदिन पारिवारिक कलह से परेशान है। कार्यालय में ठीक ढंग से कार्य नहीं कर पाता है। गहरे अवसाद के दौर से गुजर रहा है। हालाँकि ऐसा नहीं है कि उसने धूमपान छोड़ने की कोशिश न की हो। लेकिन वह ऐसा नहीं कर सका। मनोविज्ञान के छात्र होने के नाते मैं उसके लिए कुछ करना चाहूँगा। सबसे पहले मैं उसके इस नकारात्मक सोच कि धूम्रपान को वह नहीं छोड़ पाएगा। इसे सकारात्मक सोच में बदलूँगा।
उसमें आत्मविश्वास जगाने के बाद उसे किसी ऐसे चिकित्सक या केन्द्र में ले जाऊँगा, जहाँ इस प्रकार की आदतों को छुड़वाने का काम किया जाता हो। मैं इस संबंध में उसके परिवार वालों से भी बात करूँगा उनको भी आश्वस्त करूँगा और परामर्श दूंगा कि सब काम स्नेह, प्रेम और प्यार से संभव हो सकता है। इसमें सभी व्यक्ति की बराबर की भागीदारी होनी चाहिए। सभी को अपनी-अपनी भूमिका निभानी होगी। जब सब्र एक साथ इस काम में लगेंगे तो मेरे मित्र में आत्म-विश्वास जगेगा और दुगुने जोश से धूम्रपान को छोड़ने की कोशिश करेगा और अंत में उसे इसमें सफलता मिलेगी।
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