| 8. पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधन |
प्रश्न 1. रियो सम्मेलन के क्या परिणाम हुए?
उत्तर- रियो सम्मेलन के परिणाम–
- रियो सम्मेलन से यह निष्कर्ष निकला कि विश्व के धनी देश और विकसित देश (उत्तरी गोलार्द्ध) और विकासशील देश (दक्षिणी गोलार्द्ध) पर्यावरण के अलग-अलग मुद्दों के समर्थक हैं।
- उत्तरी देशों के मुख्य चिंता ओजोन परत की छेद और वैश्विक तापवृद्धि (Global Warming) को लेकर थी। जबकि दक्षिणी देश आर्थिक विकास और पर्यावरण प्रबंधन के आपसी रिश्ते को सुलझाने के लिए ज्यादा चिंतित थे।
- रियो सम्मेलन में जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता और वानिकी के संबंध में कुछ नियमाचार निर्धारित हुए।
- इसमें ‘अजेंडा-21’ के रूप में विकास के कुछ तौर तरीके से सुझाए गए।
- सम्मेलन में इस बात पर सहमति बनी कि आर्थिक वृद्धि में पर्यावरण को क्षति न पहुँचे।
प्रश्न 2. ‘विश्व की साझी विरासत’ का क्या अर्थ है? इसका दोहन और प्रदूषण कैसे होता है?
उत्तर- विश्व की साझी विरासत–
- विश्व के कुछ भाग और क्षेत्र किसी एक देश के संप्रभु क्षेत्राधिकार से बाहर होते हैं।
- इनका प्रबंधन साझे तौर पर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय द्वारा किया जाता है । इन्हें ही साझी विरासत या वैश्विक संपदा कहते हैं।
- इनमें पृथ्वी का वायुमंडल, अंटार्कटिका, समुद्री सतह और बाहरी अंतरिक्ष शामिल हैं।
विश्व की साझी विरासत का दोहन और प्रदूषण के तरीके–
- पृथ्वी के उपरी वायुमंडल में ओजोन गैस की मात्रा में निरंतर कमी हो रही है। वस्तुतः ऐसा औद्योगीकरण के कारण है। पश्चिमी देशों का इस कार्य में अधिक हाथ रहा है।
- अंटार्कटिक क्षेत्र के कुछ हिस्से अवशिष्ट पदार्थ जैसे तेल के रिसाव के दबाव में अपनी गुणवत्ता खो रहे हैं।
- सम्पूर्ण विश्व में समुद्री तटों पर प्रदूषण बढ़ रहा है। इसका तटवर्ती जल जमीन क्रियाकलाप से प्रदूषित हो रहा है।
- अंतरिक्ष में विभिन्न देश तेजी से प्रयोग कर रहे हैं और उसे प्रदूषित कर रहे हैं।
प्रश्न 3. ‘साझी जिम्मेवारी लेकिन अलग-अलग भूमिकाएं’ से क्या अभिप्राय है। हम इस विचार को कैसे लागू कर सकते हैं?
उत्तर- साझी जिम्मेवारी लेकिन अलग-अलग भूमिकायें एवं लागू करने के तरीके:
राष्ट्र संघ नियमाचार (UNFCC-1992) में बताया गया कि इस संधि को स्वीकार करने वाले देश अपनी क्षमता के अनुरूप पर्यावरण के अपक्षय में अपनी हिस्सेदारी के आधार पर साझी परंतु अलग-अलग जिम्मेवारी निभाते हुए पर्यावरण की सुरक्षा के प्रयास करेगें। इस बात पर सभी देश सहमत थे कि ऐतिहासिक रूप से भी और मौजूदा समय में भी ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में सबसे अधिक हिस्सा विकसित देशों में ग्रीन हाउस गैसों का है।
यह बात भी स्वीकार की गई है कि विकासशील देशों का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन अपेक्षाकृत कम है। इस कारण चीन, भारत और अन्य विकासशील देशों को क्योटो प्रोटोकॉल की बाध्यताओं से अलग रखा गया है। विकसित देशों के समाजों का वैश्विक पर्यावरण पर दबाव ज्यादा है और इन देशों के पास पर्याप्त प्रौद्योगिकी एवं वित्तीय संसाधन है ऐसे में टिकाऊ विकास के अंतर्राष्ट्रीय आयाम में विकसित देश अपनी विशेष जिम्मेदारी स्वीकार करेगें।
प्रश्न 4. वैश्विक पर्यावरण की सुरक्षा से जुड़े मुद्दे सन् 1990 के दशक से विभिन्न देशों के प्राथमिक सरोकार क्यों बन गए हैं?
उत्तर- वैश्विक पर्यावरण की सुरक्षा विभिन्न देशों के प्राथमिक सरोकार:
वैश्विक पर्यावरण को विभिन्न कारणों विभिन्न प्रकार की हानि उठानी पड़ रही है जिसका असर सभी देशों पर पड़ रहा है। इसलिए वैश्विक पर्यावरण की सुरक्षा विभिन्न देशों के प्राथमिक सरोकार बन गए हैं। पर्यावरण को बचाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर और अधिकांश स्थानीय स्तर पर सक्रिय हैं। हैं। ये आंदोलन ताकतवर सामाजिक आंदोलन का रूप धारण कर रहे हैं। भारत सहित अनेक देशों के वन आंदोलन पर पर्याप्त दबाव है।
यद्यपि खनिज उद्योग विश्व अर्थयवस्था का एक प्रमुख अंग है परंतु बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के कारण इससे पर्यावरण को भारी क्षति हुई है। इससे भूमि और जलमार्ग प्रदूषित हुआ है और स्थानीय वनस्पतियों की कमी हुई है। इसी प्रकार के आंदोलन बांधों के खिलाफ चल रहे हैं। वस्तुतः अनेक देशों में बांधों के निर्माण की होड़ लगी हुई है। भारत में विरोधी और नदी प्रदूषण के खिलाफ आंदोलन चल रहे हैं जिसमें नर्मदा आंदोलन प्रसिद्ध है।
प्रश्न 5. पृथ्वी को बचाने के लिए जरूरी है कि विभिन्न देश सुलह और सहकार की नीति अपनाएं। पर्यावरण के सवाल पर उत्तरी और दक्षिणी देशों के बीच जारी वार्ताओं की रोशनी में इस कथन की पुष्टि करें।
उत्तर- पृथ्वी को बचाने के लिए विभिन्न देशों की सुलह और सहकार की नीति-पृथ्वी को बचाने के लिए उत्तर और दक्षिण के देशों के बीच सुलह और सहकार की नीति होनी चाहिए। हालांकि दोनों (उत्तर और दक्षिण के देश) यह जिम्मेदारी एक-दूसरे पर थोपना चाहते हैं। उत्तर के देशों का कहना है कि पृथ्वी को बचाने में सभी देशों का योगदान होना चाहिए। इसके विपरित दक्षिण के देशों का कहना है कि ओजोन परत में उत्सर्जन उत्तरी देशों के अधिक औद्योगीकरण के कारण हुआ है और उनके पास भरपूर संसाधन हैं। इसलिए पृथ्वी को बचाने में उनका अधिक योगदान होना चाहिए। इन विवादों के प्रकाश में विभिन्न देशों के बीच 1992 में क्योटो प्रोटोकॉल नामक समझौता हुआ जिस पर सभी देशों की सहमति 1997 में हुई। इस समझौते के लिए कुछ सिद्धांत निर्धारित किये गये और सिद्धांत की इस रूपरेखा पर सहमति जताते हुए विभिन्न देशों के हस्ताक्षर हुए।
प्रश्न 6. विभिन्न देशों के सामने सबसे गंभीर चुनौती वैश्विक पर्यावरण को आगे कोई नुकसान पहुंचाए बगैर आर्थिक विकास करने की है। यह कैसे हो सकता है? कुछ उदाहरणों के साथ समझाएँ।
उत्तर- रियो सम्मेलन में इस बात पर सहमति बनी कि आर्थिक वृद्धि से पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए। इसे टिकाऊ विकास का तरीका कहा गया परंतु समस्या यह है कि यह कैसे हो सकता है। कुछ आलोचकों का कहना है कि एजेंडा-21 का झुकाव पर्यावरण संरक्षण को सुनिश्चित करने के बजाए आर्थिक वृद्धि की ओर है। वस्तुतः आर्थिक वृद्धि को रोके बिना पर्यावरण को बचाने का उपाय करना चाहिए। इसके लिए विकल्पों पर विचार करना चाहिए। उदाहरण के लिए पेट्रोल के स्थान पर जल विद्युत जैसे साधनों का प्रयोग करना चाहिए। प्राकृतिक गैस के स्थान पर सौर ऊर्जा का विकास करना चाहिए।
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