| 2. राजा, किसान और नगर आरंभिक : राज्य और अर्थव्यवस्थाएँ |
प्रश्न 1. आरम्भिक ऐतिहासिक नगरों में शिल्पकला के उत्पादन के प्रमाणों की चर्चा कीजिए। हड़प्पा के नगरों के प्रमाण से ये प्रमाण कितने भिन्न हैं?
उत्तर- आरम्भिक ऐतिहासिक नगरों में शिल्पकला के उत्पादन के प्रमाण तथा हड़प्पा के नगरों से भिन्नता: आरम्भिक ऐतिहासिक नगरों में शिल्पकला के उत्पादन के प्रमाण स्वरूप अभिलेख, ग्रंथ, सिक्के तथा चित्र मिलते हैं। ये प्रमाण विभिन्न ऐतिहासिक पक्षों के बारे में पूर्ण जानकारी देने में असमर्थ हैं। 1830 सा०यु० में भारतीय अभिलेखों के अध्ययन की कुछ नई महत्त्वपूर्ण विधियाँ अस्तित्त्व में आईं।
ईस्ट इण्डिया कंपनी के एक अधिकारी जेम्स प्रिंसेप.ने प्राचीन शिलालेखों तथा सिक्कों में प्रयोग की गई ब्राह्मी तथा खरोष्ठी लिपियों को पहली बार पढ़ा। इन अभिलेखों में पियदस्सी अर्थात् अशोक के विषय में वर्णन किया गया था। बौद्ध ग्रंथों के अनुसार अशोक भारत के महान् शासकों में से एक था।
यूरोपीय तथा भारतीय इतिहासकार अब विभिन्न भाषाओं में लिखे गए अभिलेखों तथा ग्रंथों की सहायता से उन महत्त्वपूर्ण वंशों के तिथिक्रम में इतिहास का वर्णन करने लगे जिन्होंने भारतीय उपमहाद्वीप में शासन किया।
इस प्रकार विद्वानों को प्राचीन भारतीय राजनीतिक इतिहास की खोज करने की नई दिशा मिली। इसी के परिणामस्वरूप 20वीं शताब्दी के आरम्भ तक प्राचीन भारत के राजनीतिक इतिहास की रूपरेखा सामने आई। इसके बाद विद्वानों ने राजनीतिक परिवर्तनों और आर्थिक तथा सामाजिक विकासों के बीच संबंध का पता लगाने की दिशा में कार्य किया। ज्ञात हुआ कि ऐसे संबंध परोक्षतः बने थे।
ये हड़प्पा नगरों के प्रमाणों से आरंभिक ऐतिहासिक नगरों के प्रमाण भिन्न थे। ऐसा इसलिए कि इन पर अंकित लिपि को पढ़ लिया गया है, इसलिए कुछ बातें स्पष्ट हो गयी हैं। हड़प्पा नगरों के प्रमाणों की लिपि पढ़ी नहीं जा सकी है। इसलिए स्पष्ट नहीं है। हड़प्पा से साक्ष्य भी कम ही प्राप्त हुए हैं।
प्रश्न 2. महाजनपदों के विशिष्ट अभिलक्षणे का वर्णन कीजिए।
उत्तर- महाजनपदों के विशिष्ट अभिलक्षण:
1. बौद्ध धर्म और जैन धर्म के ग्रंथों में महाजनपदों या 16 राज्यों के नाम मिलते हैं। इन ग्रंथों में महाजनपदों के नाम आपस में नहीं मिलते फिर भी अवन्ति, वत्स, कोशल, मगध, कुरु तथा पंचाल जैसे महाजनपदों के नामों का कई बार उल्लेख हुआ है। ऐसा प्रतीत होता है कि ये महाजनपद अन्य जनपदों से अधिक शक्तिशाली थे। यह सभी जनपद गंगा-यमुना की घाटियों में स्थित थे।
2. इन महाजनपदों के इतिहास की पूर्ण जानकारी नहीं मिलती, तथापि इनसे छठी शताब्दी सा०यु०पू० में भारत की राजनीतिक स्थिति के बारे में कुछ अनुमान लगा सकते हैं। उस समय राजनीतिक एकता का अभाव था। इन 16 राज्यों के शासक आपस में लड़ते रहते थे। इन महाजनपदों की राजनीतिक उपलब्धियों के बारे में बहुत कम परंतु उनके शासन प्रबंध के विषय में पर्याप्त जानकारी मिलती है।
3. अधिकांश महाजनपदों के मुखिया राजा कहे गए हैं। इन जनपदों में से कई जनपदों को गण तो कई को संघ कहा जाता था। वस्तुत: इन राज्यों में सत्ता अल्प प्रभावशाली तथा शक्तिशाली लोगों के हाथों में केन्द्रित थी। इसको समूह शासन नाम दिया गया है। महावीर तथा बुद्ध दोनों ऐसे गणराज्यों के राजकुमार या युवराज थे। वज्जि संघ-जैसे कुछ राज्यों में, राजा ही संयुक्त रूप में भूमि आदि संसाधनों पर नियंत्रण रखते थे।
4. प्रत्येक महाजनपद की एक राजधानी होती थी और उसके आस-पास दुर्ग बने होते थे। नगरों के विकास, सैन्य प्रबंध तथा उच्च अधिकारियों के वेतन भुगतान हेतु संसाधनों की आवश्यकता होती थी।
5. लगभग छठी शताब्दी सा०यु०पू० के पश्चात् ब्राह्मणों ने संस्कृत भाषा के धर्मशास्त्रों की रचना का कार्य आरम्भ कर दिया था। इन धर्मशास्त्रों में शासकों तथा अन्य सामाजिक वर्गों के लिए नियम लिखे होते थे।
6. ये धर्मशास्त्र कृषकों, व्यापारियों तथा कारीगरों से कर तथा उपहार एकत्रित करने का अधिकार महाजनपद के शासक को देते थे। धन संग्रह करने के लिए पड़ोसी राज्यों पर आक्रमण करने की मनाही नहीं थी। धीरे-धीरे कुछ शक्तिशाली राज्यों ने स्थायी सेनाएँ तथा अधिकारियों की भर्ती कर ली। अन्य शासक अपनी आवश्यकतानुसार किसानों में से ही सैनिकों की भर्ती कर लेते थे।
प्रश्न 3. सामान्य लोगों के जीवन का पुनर्निर्माण इतिहासकार कैसे करते हैं?
उत्तर- इतिहासकारों द्वारा सामान्य लोगों के जीवन का पुनर्निर्माण:
इतिहासकार सामान्य लोगों के जीवन का पुनर्निर्माण करने के लिए विभिन्न प्रकार के ऐतिहासिक स्रोतों-साहित्य और पुरावस्तुओं का सहारा लेते हैं। पुरातत्त्व की खोज से पूर्व साहित्यिक ग्रन्थों के आधार पर इतिहास लिखा गया था। उदाहरण के लिए-आर्यों के जीवन का इतिहास वैदिक ग्रंथों के आधार पर पुनर्निर्मित किया गया है।
बौद्धकाल और जैनकाल का अनेक विवरण इस काल के ग्रंथों में वर्णित बातों के आधार पर दिया गया है। मौर्यकालीन जनजीवन की बहुत कुछ जानकारी बौद्ध और जैन ग्रंथों से होती है। भारत में समय-समय पर विदेशी यात्रियों का आगमन होता रहा है। उन्होंने अपने यात्रा विवरण में भारत के कई क्षेत्रों का वर्णन किया है।
उदाहरण के लिए- यूनानी यात्री मेगस्थनीज चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में 302 सा०यु०पू० से 298 सा०यु०पू० तक रहा। उसने अपनी पुस्तक इंडिका में भारत के आम लोगों के जीवन का रोचक वर्णन किया है। कौटिल्य द्वारा रचित अर्थशास्त्र मौर्यकालीन जनजीवन का इतिहास प्रस्तुत करता है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि इतिहासकार साहित्य के आधार पर सामान्य लोगों के जीवन का पुनर्निर्माण करते हैं।
पुरातात्विक साधन यथा-अभिलेख, सिक्के, मूर्तियाँ, स्मारक, भवनावशेष और मनके भी लोगों के जीवन का वर्णन करने में इतिहासकारों की मदद करते हैं। उदाहरण के लिए-कुषाण काल में सोने के सिक्के अधिक मिलने से ऐसा प्रतीत होता है कि सामान्य लोगों की आर्थिक दशा अच्छी थी। हड़प्पा के स्थलों से बैलगाड़ी के खिलौने मिलना इतिहासकारों के इस उल्लेख का आधार बनता है कि लोग परिवहन के साधन के रूप में बैलगाड़ी का प्रयोग करते थे।
प्रश्न 4. पाण्ड्य सरदार (स्रोत 3) को दी जानेवाली वस्तुओं की तुलना दंगुन गाँव (स्रोत 8) की वस्तुओं से कीजिए। आपको क्या समानताएँ और असमानताएँ दिखाई देती हैं?
उत्तर- समानताएँ:
दोनों जगह दी गई सामग्रियों में फूल शामिल हैं। दोनों ही जगह दान में फूल दिए गए हैं।
असमानताएँ:
पाण्ड्य सरदारों को दी जाने वाली वस्तुएँ दंगुन गाँव की वस्तुओं से अधिक हैं। इसमें दैनिक जीवन के उपयोग की अधिक वस्तुएँ शामिल हैं। दंगुन गाँव में वस्तुओं की संख्या कम है। यहाँ प्रभावती गुप्त ने सम्पूर्ण गाँव की सम्पत्ति और करारोपण की व्यवस्था को भी दान में दे दिया है।
प्रश्न 5. अभिलेखशास्त्रियों की कुछ समस्याओं की सूची बनाइए।
उत्तर- अभिलेखशास्त्रियों की कुछ समस्याएँ –
- कई अभिलेखों के अक्षरों को हल्के ढंग से उत्कीर्ण किया गया है। इसीलिए समय के साथ वे अक्षर घिस भी गये हैं। उन्हें पढ़ने में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
- अनेक अभिलेखों के अक्षर लुप्त हो गये हैं। ऐसे अनेक प्रसंगों से माध्यम से जोड़कर पढ़ा जाता है।
- अभिलेखों में वर्णित बातों का अर्थ निकालना एक दुष्कर कार्य है, क्योंकि कुछ अर्थ किसी विशेष स्थान या समय से संबंधित होते हैं।
- अभिलेख हजारों की संख्या में प्राप्त हुए हैं परंतु उनमें से कुछ के अर्थ ही निकाले जा सके हैं और अधिकतर अभिलेख सुरक्षित भी नहीं हैं।
- प्रायः अभिलेखों में उन्हें तैयार करने वाले लोगों का ही उल्लेख होता है। इसलिए अन्य विवरण के लिए प्रत्यक्ष उपायों का सहारा लेना पड़ता है।
प्रश्न 6. मौर्य प्रशासन के प्रमुख अभिलक्षणों की चर्चा कीजिए। अशोक के अभिलेखों में इनमें से कौन-कौन से तत्त्वों के प्रमाण मिलते हैं?
उत्तर- मौर्य प्रशासन के प्रमुख अभिलक्षण एवं अशोक के अभिलेखों के तत्त्व:
1. केन्द्रीय प्रशासन:
केन्द्रीय प्रशासन के मुख्य अंग राजा, मंत्रिपरिषद् तथा उच्च सरकारी अधिकारी आदि थे। राजा सर्वेसर्वा होता था। सारा नागरिक एवं सैनिक प्रशासन उसी की इच्छानुसार चलता था। वह एक शानदार महल में बड़े ठाट-बाट से रहता था परंतु प्रजा की भलाई को भी कभी नहीं भूलता था। राजा को परामर्श देने के लिए एक मंत्री-परिषद् होती थी।
प्रत्येक मंत्री के पास कोई-न-कोई विभाग होता था। राजा तथा मंत्रियों की सहायता के लिए अध्यक्ष, अमात्य, राजुक और प्रादेशिक जैसे अनेक अधिकारी होते थे। नियुक्ति के बाद भी धम्म-महामात्त नाम के अधिकारी उनके कार्यों पर नजर रखते थे। ये सब अधिकारी बड़े चरित्रवान और ईमानदार होते थे।
2. प्रान्तीय प्रशासन:
इतने बड़े राज्य के कार्य को भली प्रकार चलाने के लिए देश को निम्नलिखित चार प्रान्तों में विभक्त किया गया था-(क) मध्य प्रान्त: इसकी राजधानी पाटलिपुत्र थी। इस प्रान्त का कार्य राजा स्वयं चलाता था। (ख) उत्तर-पश्चिमी प्रान्त: इसकी राजधानी तक्षशिला थी। (ग) पश्चिमी प्रान्त: इसकी राजधानी उज्जैन थी। (घ) दक्षिणी प्रान्त: इसकी राजधानी स्वर्णगिरि थी।
ये प्रान्त गवर्नरों के अधीन होते थे जो प्रायः राजवंश से सम्बन्ध रखते थे। इन प्रांतीय गवर्नरों तथा अधिकारियों पर कड़ी निगरानी रखी जाती थी। इस कार्य के लिए विशेष गुप्तचर छोड़ रखे थे जो राज्य में होने वाली प्रत्येक घटना की सूचना देते रहते थे। प्रान्त आगे जिलों में विभक्त थे जिनके अधिकारी को ‘स्थानिक’ कहते थे। इसके पश्चात् आजकल की तहसीलों की भांति मए गोल्डेन सीरिज पासपोर्ट टू चार गाँव से लेकर दस गाँवों के ऊपर ‘गोप’ नामक अधिकारी नियुक्त किए थे। प्रत्येक गाँव का अधिकारी ‘ग्रामिक’ कहलाता था।
3. नगर प्रबंध:
मेगस्थनीज के वृत्तान्त से पता चलता है कि पाटलिपुत्र जैस बड़े नगरों के लिए विशेष नागरिक-प्रबंध की व्यवस्था की गई थी। इस नगर के लिए तीस सदस्यों की एक समिति थी, जो छ: बोड़ों में विभक्त की गई थी। प्रत्येक प्रबंध-बोर्ड में पाँच सदस्य होते थे। ये बोर्ड निम्न ढंग से अपना कार्य करते थे – (क) पहले बोर्ड का कार्य कला-कौशल की देखभाल करना, कारीगरों के वेतन नियत करना तथा दु:ख में उनकी सहायता करना आदि था।
(ख) दूसरे बोर्ड का कार्य विदेशियों की देखभाल करना, उनके लिए सुख सामग्री उपलब्ध कराना तथा उनकी निगरानी रखना आदि था। (ग) तीसरे बोर्ड का कार्य जन्म-मरण का हिसाब रखना था ताकि कर आदि लगाने तथा अन्य प्रबंध करने में सुविधा रहे। (घ) चौथे बोर्ड का कार्य व्यापार का प्रबंध करना, तौल में बाटों तथा माल के पैमाने की जांच-पड़ताल करना और कानून के विरुद्ध चलने वालों को दण्ड देना आदि था। (ड़) छठे बोर्ड का कार्य वस्तुओं की बिक्री पर लगे हुए विक्रय-कर को एकत्र करने का था।
4. आय एवं व्यय:
सरकार की आय का सबसे बड़ा साधन भूमि-कर था। जो प्रायः भूमि की उर्वरता के हिसाब से 1/4 से 1/6 भाग तक लिया जाता था। आय के अन्य साधन-खानों से कर, वनों से आय, सीमा से बाहर जाने वाली वस्तुओं पर कर, जलयानों पर कर और जुर्माना इत्यादि थे। इस प्रकार जो धन इकट्ठा होता था उसे राजा और दरबार, सेना के अधिकारियों के वेतन, अस्पतालों व सड़कों के बनाने, दान देने, सिंचाई के साधनों को सुधारने आदि पर व्यय किया जाता था। इस प्रकार आय और व्यय का ढंग बड़ा सुव्यवस्थित था।
5. न्याय प्रबंध:
मौर्य राजा न्याय की ओर विशेष ध्यान देते थे और स्वयं भी बड़ी लगन से न्याय करते थे। गाँव में पंचायतें न्याय का कार्य करती थीं और नगर में नगर-कचहरियाँ थीं। इनमें नागरिकों तथा अधिकारियों दोनों के मामलों की सुनवाई और न्याय होता था। इन स्थानीय न्यायालयों (Local Courts) की अपील प्रान्तीय न्यायालयों में की जाती थी।
इन प्रान्तीय न्यायालयों के ऊपर एक केन्द्रीय न्यायालय था जो पाटलिपुत्र में स्थित था। प्रान्तों की अपील राजा स्वयं सुना करता था। दण्ड बड़े कठोर थे। जुर्माना करना तथा कोड़े लगाने से लेकर हाथ-पांव आदि काट देना और जघन्य अपराध के लिए प्राण दण्ड देना प्रचलित था। अशोक के समय में दण्ड-व्यवस्था कुछ हल्की कर दी गई थी। न्याय प्रबंध इतना अच्छा था कि चोरी और अन्य अपराध बहुत कम हुआ करते। इस विषय में मेगस्थनीज भी लिखता है कि पारलिपुत्रं, जिसकी जनसंख्या कोई 6,00,000 थी, वहाँ 8 पौंड (लगभग 120 रुपये) से अधिक किसी भी दिन चोरी नहीं होती थी।
6. प्रजा हितकारी कार्य:
मौर्य सम्राटों ने प्रजा के हित को ध्यान में रखकर ही सभी कार्य संपन्न किए। देश को छोटे-छोटे भागों में बांटना, एक सुव्यवस्थित न्याय-प्रणाली चलाना, अधिकारियों को कटोर दण्ड देना, घूसखोर अधिकारियों पर जासूस छोड़ना और लोगों के नैतिक स्तर को ऊँचा करने के लिए धम्म-महामात्त नाम के अधिकारियों की नियुक्ति करना आदि इस बात को स्पष्ट करते हैं कि मौर्य शासकों ने जनहित को सर्वोपरि महत्व दिया। केवल यही नहीं, देश में सिंचाई के लिए तालाब और नहरें बनाई गईं, व्यापार की उन्नति के लिए सड़कें बनाई गई तथा उनके दोनों और छायादार वृक्ष लगाए गए ताकि प्रजा सुख से रह सके।
7. सैनिक प्रबंध:
चन्द्रगुप्त मौर्य के पास एक विशाल सेना थी। इसमें कोई 6,00,000 पैदल; 30,000 घुड़सवार; 9,000 हाथी और 8,000 रथ थे। प्रत्येक हाथी पर प्रायः चार व्यक्ति और रथ पर तीन व्यक्ति हुआ करते थे। इस प्रकार उसकी सेना 7,00,000 के लगभग थी। इस समस्त सेना को नगद वेतन दिया जाता था। केवल उन्हीं व्यक्तियों को सिपाही चुना जाता था जो बड़े वीर व धैर्यवान होते थे। सेना का नेतृत्व राजा स्वयं करता था। इतनी बड़ी सेना के प्रबंध के लिए तीस सदस्यों का एक पृथक् सेना-विभाग था। इस विभाग की छ: समितियाँ थीं जिनके अधिकार में –
- सामुद्रिक बेड़े
- यातायात
- पैदल सेना
- घुड़सवार सेना
- रथ तथा
- हाथियों आदि का प्रबंध होता था।
- सारी मौर्य सेना अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित थी।
प्रश्न 7. यह बीसवीं शताब्दी के एक सुविख्यात अभिलेखशास्त्री डी.सी. सरकार का वक्तव्य है: भारतीयों के जीवन, संस्कृति और गतिविधियों का ऐसा कोई पक्ष नहीं है जिसका प्रतिबिंब अभिलेखों में नहीं है: चर्चा कीजिए।
उत्तर- अभिलेख इतिहास के लिखित साधन हैं और इतिहास की रचना में इनका महत्त्वपूर्ण स्थान है। अशोक ने अभिलेखों का पर्याप्त विस्तार किया। यह अशोक के जीवन, उसके अशोक के महान् कार्यों और धर्म तथा उपाधियों के बारे में बताते हैं। यह सब स्रोत “देवनाप्रिय” तथा “पियदस्सी” के नाम से अंकित हैं।
इन अभिलेखों से ज्ञात होता है कि उसका शासन-प्रबंध सहानुभूतिपूर्ण था। अपने चौथे अभिलेख में उसने कहा है कि “जिस प्रकार एक व्यक्ति अपने बच्चों के लिए एक सुयोग्य परिचारिका का प्रबंध करता है, उसी प्रकार मैं चाहता हूँ कि मेरे अधिकारी भी प्रजा के साथ सद्व्यवहार करें और सुयोग्य हों।” इन्हीं अभिलेखों से अशोक के राज्य विस्तार का पता चलता है। धार और अजमेर में तो चट्टानों पर संस्कृत नाटक तक खुदे मिले हैं। इलाहाबाद का अभिलेख हरिषेण ने लिखा था।
इसमें 33 पंक्तियाँ हैं। यह अभिलेख हमें समुद्रगुप्त की नियुक्ति, उसकी विजयों तथा उसके महान कार्यों के बारे में बताता है। महरौली के लौह स्तंभ में न केवल हमें चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के महान कार्यों का वर्णन मिलता है बल्कि यह भी ज्ञात होता है कि उस समय तक धातु कला काफी विकसित हो चुकी थी।
इस प्रकार इतिहास के निर्माण में अभिलेख अत्यन्त सहायक हैं। अभिलेखों के महत्त्व के बारे में स्मिथ (Smith) महोदय का कहना है, “प्रारम्भिक हिन्दू इतिहास में घटनाओं की तिथि का जो ठीक-ठीक ज्ञान अभी तक प्राप्त हो सका है वह प्रधानतः अभिलेखों के साक्ष्य पर आधारित है।”
प्रश्न 8. उत्तर-मौर्यकाल के विकसित राजत्व के विचारों की चर्चा कीजिए।
उत्तर- उत्तर-मौर्यकाल में विकसित राजत्व के विचार:
भारत के दक्षिणी क्षेत्रों में चोल, चेर, और पाण्ड्य जैसी सरदारियों का उदय हुआ। सरदार एक शक्तिशाली व्यक्ति होता था। ये स्थायी और समृद्ध होते थे। इन राज्यों के विषय में तमिल संगम ग्रंथों से जानकारी मिलती है। व्यापार आदि से सरदारों को पर्याप्त आमदनी होती थी। इनमें मध्य एवं पश्चिम भारत के शासक सातवाहन और उपमहाद्वीप के पश्चिमोत्तर और पश्चिम में शासन करने वाले मध्य मूल के शक शासक शामिल थे।
प्राचीन भारतीय राजाओं ने अपनी महत्त बढ़ाने के लिए अपना नाम देवी-देवताओं से जोड़ा। इसके अच्छे उदाहरण कुषाण शासक हैं। उन्होंने अपने सिक्कों एवं मूर्तियों के माध्यम से राजधर्म उत्कीर्ण कराए। मथुरा स्थित माट के एक देवस्थान पर कुषाण शासकों की एक विशाल मूर्ति स्थापित की गई है। ऐसी मूर्तियाँ अन्य कोई स्थानों पर भी दिखाई देती हैं। ऐसा अपनी महत्त बढ़ाने के लिए किया गया। प्रसिद्ध कुषाण शासक कनिष्क ने अपने नाम के आगे ‘देवपुत्र’ जोड़ा था। इस प्रकार राजत्व के विचार का निरंतर विकास हो रहा था।
चौथी शताब्दी के गुप्त सम्राटों के काल में राजत्व की नई विचारधारा पनपी। ये अपने को सम्राट कहते थे और इनके अधीन सामन्त होते थे। ये सम्राट सेना स्थानीय संसाधन के लिए सामंतों पर निर्भर थे। कभी-कभी सामन्त शासक पर भारी पड़ता था और शासक को हटाकर स्वयं सम्राट बन जाता था। गुप्त सम्राटों ने अपने नाम के सिक्के चलवाये, मुद्रायें बनवायी और प्रशस्तियाँ लिखवायीं। उन्होंने महाराजाधिराज जैसी बड़ी-बड़ी उपाधियाँ धारण की। प्रत्यागप्रशस्ति से समुद्रगुप्त के लिए लिखा गया है – “वे देवताओं में कुबेर, वरूण, इन्द्र और यम के तुल्य हैं।”
प्रश्न 9. वर्णित काल में कृषि के तौर-तरीकों में किस हद तक परिवर्तन हुए?
उत्तर- कृषि के तौर-तरीकों में परिवर्तन:
उत्तर वैदिक काल में लोहे की खोज हो चुकी थी और सर्वप्रथम इसका प्रयोग हल के फाल और तीरों के फलक बनाने में किया गया। इससे कृषि के तौर तरीकों में भारी परिवर्तन हुए। छठी शताब्दी सा.यु.पू. से गंगा और कावेरी की घाटियों के उर्वर कछारी क्षेत्र में हल का प्रयोग बढ़ गया था। जिन क्षेत्रों में भारी वर्षा होती थी वहाँ उर्वर भूमि की जुताई लोहे के फाल वाले हलों से की जाने लगी। इसके अलावा गंगा घाटी में धान की रोपाई की वजह से उपज में भारी वृद्धि होने लगी। इससे पहले किसानों को पर्याप्त मेहनत करनी पड़ती थी।
यद्यपि लोहे के फाल वाले हल की वजह से फसलों की उपज बढ़ने लगी लेकिन ऐसे हलों का उपयोग उपमहाद्वीप के कुछ गिने-चुने भागों तक सीमित था। पंजाब और राजस्थान जैसी अर्धशुष्क जमीन वाले क्षेत्रों में लोहे के फाल वाले हल का प्रयोग 20 वीं शताब्दी में शुरू हुआ। पूर्वोत्तर और मध्य पर्वतीय क्षेत्रों में रहने वाले किसानों ने कुदाल का उपयोग किया क्योंकि ऐसे इलाकों के लिए कुदालों से खुदाई करनी अधिक उपयोगी थी।
इस युग में उपज बढ़ाने के लिए सिंचाई के विभिन्न साधनों का उपयोग किया गया। कृषकों ने कुँओं, तालाबों और कहीं-कहीं नहरों के माध्यम से भी खेती की सिंचाई की। व्यष्टि स्तर पर प्रत्येक किसान और कृषक समुदायों ने मिलकर सिंचाई के साधन विकसित किए। व्यक्तिगत रूप से तालाबों, कुँओं और नहरों जैसे सिंचाई साधन प्रायः राजा या प्रभावशाली लोगों ने विकसित किए। उनके इन कामों का उल्लेख आर्यलेखों में है। सुदर्शन झील का उल्लेख कई अभिलेखों में मिलता है।
प्रश्न 10. मानचित्र 1 और 2 की तुलना कीजिए और उन महाजनपदों की सूची बनाइए जो मौर्य साम्राज्य में शामिल रहे होंगे। क्या इस क्षेत्र में अशोक के कोई अभिलेख मिले हैं?
उत्तर- मौर्य साम्राज्य में शामिल महाजनपद
- गांधार
- मगध
- काशी
- वत्स
- अवन्ति।
अशोक के अभिलेख: गांधार के तक्षशिला, काशी में सारनाथ, वत्स में कौशाम्बी आदि से अशोक के अभिलेख मिले हैं।
प्रश्न 11. एक महीने के अखबार एकत्रित कीजिए। सरकारी अधिकारियों द्वारा सार्वजनिक कार्यों के बारे में दिये गये वक्तव्यों को काटकर एकत्रित कीजिए। समीक्षा कीजिए कि इन परियोजनाओं के लिए आवश्यक संसाधनों के बारे में खबरों में क्या लिखा है? संसाधनों को किस प्रकार से एकत्र किया जाता है और परियोजनाओं का उद्देश्य क्या है? इन वक्तव्यों को कौन जारी रखता है और उन्हें क्यों और कैसे प्रसारित किया जाता है? इस अध्याय के चर्चित अभिलेखों के साक्ष्यों से इनकी तुलना कीजिए। आप इनमें क्या समानताएँ और असमानताएँ गते हैं?
उत्तर- छात्र स्वयं करें।
प्रश्न 12. आज प्रचलित पाँच विभिन्न नोटों और सिक्कों को इकट्ठा कीजिए। इनके दोनों ओर आप जो देखते हैं उनका वर्णन कीजिए। इन पर बने चित्रों, लिपियों और भाषाओं, माप, आकार या अन्य समानताओं और असमानताओं के बारे में एक रिपोर्ट तैयार कीजिए। इस अध्याय में दर्शित सिक्कों में प्रयुक्त सामग्रियों, तकनीकों, प्रतीकों, उनके महत्त्व और सिक्कों के संभावित कार्य की चर्चा करते हुए इनकी तुलना कीजिए।
उत्तर- छात्र स्वयं करें।
0 Comments